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आश्रम परिचय

(संतमत सत्संग आश्रम कुप्पाघाट, भागलपुर, बिहार, भारत )

आश्रम-नियमावली
 (1) आश्रम-निवास हेतु आश्रम- व्यवस्थापक से मिलकर अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य है।
 (2) आश्रम में साधारणतः तीन दिनों तक ठहरने का नियम है। किसी विशेष परिस्थिति में यह आश्रम-व्यवस्थापक के विचाराधीन है।
 (3) महिलाएँ अपने अभिभावक के साथ आने पर ही आश्रम में ठहर सकती हैं।
 (4) आश्रम के भोजनालय में भोजन- व्यवस्था के इच्छुक आगन्तुकों को दिन के भोजन के लिए प्रातः आठ बजे तथा रात के भोजन के लिए सायं पाँच बजे तक महासभा कार्यालय से कूपन प्राप्त कर लेनी चाहिए।
 (5) बाहर से आये हुए साधु-महात्माओं के भोजन की व्यवस्था आश्रम की ओर से होगी। 
 (6) आश्रम में निवास करनेवाले सभी व्यक्तियों को आश्रम की दैनिक स्तुति-प्रार्थना एवं सत्संग में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होना पड़ेगा।
 (7) ध्यानाभ्यास एवं सत्संग के समय इधर-उधर घूमना और शोरगुल करना वर्जित है।
 (8) आश्रम-अहाते के अन्दर किसी तरह की गन्दगी फैलाना तथा मादक द्रव्यों का सेवन करना सर्वथा वर्जित है। 
 (9) आश्रम का मुख्य द्वार रात के नौ बजे बन्द होने पर पुनः चार बजे ब्रह्ममुहूर्त्त में खुलता है। सायंकालीन ध्यानाभ्यास की घंटी बजने पर भी एक घंटा गेट बन्द रहता है।
 (10) गुफा देखने के इच्छुक व्यक्ति को गुफा दिखाने के लिए नियुक्त आश्रमवासी से सम्पर्क करना चाहिए।
आश्रम के दर्शनीय स्थान
 (i) बाबा देवी साहब पुस्तकालय
 परमसंत बाबा देवी साहब महर्षि मे ँही ँ परमहंस के गुरुदेव थे। उन्हीं के नाम पर संग्रहालय के नीचे और महासभा कार्यालय के सटे उत्तर बगल में एक पुस्तकालय (वाचनालय) है। इसमें धार्मिक पुस्तकों एवं पत्रिकाओं के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। पुस्तकें अनेक आलमारियों में सुरक्षित रखी गई हैं। यहाँ कई दैनिक और मासिक पत्र-पत्रिकाएँ मँगाई जाती हैं। पाठकों के लिए टेबुल-कुर्सी आदि की समुचित व्यवस्था है। 
(ii) ध्यानकक्ष
 आश्रम के आतंरिक परिसर में पूर्व की ओर चमडि़या निवास के पहले एक रास्ता अंदर की ओर जाता है। इसमें प्रवेश करने पर दाहिनी ओर नवनिर्मित ध्यानकक्ष मिलता है। यह नवनिर्मित ध्यानकक्ष वातानुकूलित है। यहाँ बाहर का शोर-गुल नहीं सुनाई पड़ता है। इसकी छत शंक्वाकार होने के कारण बाहर और भीतर दोनों ही ओर से सुंदर दिखती है। इसके अंदर 100 साधकों के बैठने की जगह है। सन् 2002 ई0 से मास-ध्यान साधना-शिविर इसी में आयोजित किया जाता है।  
(iii) संग्रहालय
 आश्रम में मुख्य-द्वार में प्रवेश करने के साथ ही सामने एक भव्य सुंदर भवन दीखता है। इसमें नीचे कार्यालय आदि के लिए कुछ कमरें बने हैं और ऊपर का हॉल संग्रहालय के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस संग्रहालय में महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज द्वारा उपयोग में लायी गयी सभी वस्तुएँ आगन्तुकों के दर्शन के लिए रखी जाएँगी। यथा-उनके कपड़े, पुस्तकें, हस्तलेख, खड़ाऊँ, व्हीलचेयर, कुर्सी, टेबुल, घड़ी, आदि। इनके जीवन के विभिन्न क्षणों की तस्वीरें इस संग्रहालय में सजायी जाएँगी। 
(iv) गोशाला
 आश्रम के आंतरिक परिसर में पश्चिम की ओर एक द्वार है, जिसके सटे दक्षिण गोशाला है। महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज अपने समय में गायों का बहुत ध्यान रखते थे। इनका कहना है कि हम अपनी माँ का दूध तो कुछ ही महीने पीते हैं, पर गाय का दूध जीवन-भर पीते हैं। इसलिए गाय हमारी माता से बढ़कर है। वर्तमान गुरुदेव को भी गायों से बहुत लगाव है। ये स्वयं गोशाला निरीक्षण के लिए पधारते हैं और गायों की सेवा के लिए सबों को प्रेरित करते हैं। 
(v) उद्यान
 आश्रम सभी ओर से फूलों और पेड़ों की हरियाली से आच्छादित है, पर मुख्य उद्यान आश्रम-दर्शन हेतु आनेवाले लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र है। यह उद्यान पूर्व में समाधि-मंदिर, पश्चिम में ध्यान कक्ष सह संग्रहालय, उत्तर में गंगा नदी और दक्षिण में सत्संग प्रशाल से घिरे होने के कारण विशेष शोभा बिखेरता है।
 उद्यान प्रवेश करने के लिए ध्यानकक्ष के उत्तर से जालीदार दरवाजा लगा है। संग्रहालय के दक्षिण उद्यान के ऊपर से एक लंबा पुल बना है। जिसपर चढ़कर महर्षि मे ँहीँ-समाधि मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है। इस पुल पर से लोग उद्यान का अवलोकन करते हैं। पुल के बाएँ गंगा किनारे तक फैले विस्तृत उद्यान में मौसमी फूलों की अनेक कतारें हैं। बीच-बीच में गुलाब, अड़हुल, क्रोटन तथा अन्य झाड़ीनुमा पौधों की क्यारियाँ हैं। इन सबकी मिश्रित छटा देखते ही बनती है। उद्यान के उत्तरी भाग में गंगा के किनारे ऊँचे-ऊँचे वृक्ष दूर से ही शोभायमान होते हैं। प्रतिदिन अपराह्णकाल जब वर्तमान गुरुदेव इस उद्यान में भ्रमण करते हैं, तो उनके चरणरज को पाकर उद्यान की गरिमा और बढ़ जाती है। 
(vi) बाबा देवी साहब भवन
 मुख्यद्वार में प्रवेश करने पर सामने संग्रहालय नजर आता है। संग्रहालय के पहले ही बाईं ओर एक रास्ता गंगा के किनारे तक जाता है। इस रास्ते में थोड़ा ही आगे बढ़ने पर तीन मंजिल का एक भव्य-भवन मिलता है। इसका नाम बाबा देवी साहब भवन है। इसमें अतिथियों के ठहरने के लिए शौचालय, स्नानघर संयुक्त 30 सुसज्जित कमरे हैं। इसी भवन से जुड़ा एक अन्य भवन है। इसमें भी चार मंजिलें हैं। सबसे निचली मंजिल में आश्रम- भोजनालय है। मध्य में आम लोगों के ठहरने के लिए बड़ा-सा हॉल और प्रकाशन-विभाग का स्टोर है। ऊपरी दो मंजिलों में बाबा देवी साहब भवन की तरह ही 20 कमरे हैं। 
(vii) चबूतरा
 यह आश्रम के पश्चिमी भाग में गंगा के तट पर स्थित है। महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज इस चबूतरे पर टहला करते थे। उन्हें यह स्थान बड़ा प्रिय था। आज भी इस पवित्रतम स्थान पर आकर लोग शीतल बयार का आनंद लेते हैं। एक समय जब यह चबूतरा नहीं बना था, यहाँ गाएँ जैसे ही चरने के लिए आती थीं, गंगा में गिरकर मर जाती थीं। चबूतरा बनने के बाद ऐसी घटनाएँ बंद हो गईं।
(viii) प्राचीन-गुफा
 आश्रम के मुख्य प्रवेश-द्वार से सटे हुए पश्चिम की ओर चदरे के छाजन का एक ऊँचा मकान-जैसा ढाँचा है। इसी में प्राचीन गुफा है। इस गुफा में आस-पास पहले जंगल-सा था। इसमें हिंसक जीव-सर्प आदि रहते थे। गुफा के भीतर अँधेरा रहने के कारण चमगादड़ का साम्राज्य था। जिस गुफा को कोई पूछनेवाला नहीं था, महर्षिजी ने अथक परिश्रम से साफ-सुथरा करवाकर उसके भीतर मार्च, 1933 ई0 से नवम्बर, 1934 ई0 तक कठिन तपस्या कर अपनी अलौकिक ज्योति से आलोकित कर उसे दर्शनीय बना दिया है। इस गुफा को देखने के लिए देश-विदेश के लोग बराबर आया करते हैं।
 गुफा के सम्बन्ध में तरह-तरह की किंवदन्तियाँ सुनने में आती हैं, उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया जाता है-
 (1) कुछ लोगों का कहना है कि देवासुर- संग्राम में जब दानव लोग हार गये, तो वे जमीन वगैरह (गुफाओं) में छिपकर रहने लगे। इस गुफा का निर्माण मय दानव के द्वारा उसी समय कराया गया है।
 (2) कहा जाता है कि कौरवों ने पाण्डवों को जलाने के लिए वारणावर्त्त में लाक्षागृह का निर्माण कराया था, जिसमें 364 कमरे थे। वह स्थान यही है। विदुरजी के एक मित्र बड़े मायावी थे। उन्होंने वराह का रूप धारण कर पाण्डवों के भागने के लिए उस लाक्षागृह के अन्दर इस विचित्र गुफा का निर्माण किया था। उस लाक्षागृह को माया का घर कहा जाता था, इसलिए इस मुहल्ले का नाम मायागंज पड़ा और वारणावर्त्त का ही बरारी नाम पड़ा।
 (3) एक बार अपने शिष्यों के साथ भगवान बुद्ध पर्यटन करते हुए यहाँ आये थे। उन्होंने कहा था कि जब मैं बैल-शरीर में था, तो इसी गुफा में रहता था। बैल का उल्लेख ह्वेनसांग की डायरी के वर्णन से भी मिलता है। 
 (4) भागलपुर का सन् 1992 ई0 का गजेटियर देखने से पता चलता है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग जब भारत-भ्रमण कर रहे थे, तो यहाँ पर भी आये थे और निम्नलिखित बातों का उल्लेख उन्होंने अपनी डायरी में किया था-‘बरारी’ में गुफाएँ हैं, उनमें ऐसे सिक्के पाये गये हैं, जो ईस्वी सन् के पूर्व शताब्दियों तक उत्तरी भारतवर्ष में प्रचलित थे।’ ह्वेनसांग ने इस स्थान के विषय में बुद्ध के जन्मकाल (ईसा के पूर्व 543 वर्ष) से पूर्व की एक कथा का उल्लेख इस प्रकार किया है-
 एक चरवाहा चम्पा के निकट अपने पशुओं को पालता था। एक दिन उस चरवाहे का एक बैल अपने झुण्ड से पथभ्रष्ट हो गया और ऐसा अनुमान किया जाने लगा कि वह बैल खो गया; परन्तु संध्या-समय वह बैल लौटा। उस समय उसकी कान्ति देदीप्यमान हो गई थी। यहाँ तक कि उसका विचित्र लक्षण हो गया था। अन्यान्य लोग बैल को देखकर भयभीत हुए और उसके निकट नहीं जाने लगे। ऐसी दशा कुछ काल तक रही। अन्त में वह चरवाहा एक दिन उस बैल के पीछे लगा और चट्टानों की दरारों होकर चार हजार फुट लम्बी दहलीज (गैलरी) को पार करते हुए उसने उस बैल का अनुसरण किया। दहलीज के बाद उसने एक सुन्दर तृण-संकुल भूमि दिव्य फल-फूल के वृक्षों से भरी हुई देखी। उन पौधों के पत्ते सुगन्धित और फल बड़े-बड़े एवं सुनहले थे। उस चरवाहे ने एक फल तोड़ा; परन्तु वह उसे चखने से डरा। तब उसने उस फल को साथ लाने की चेष्टा की; परन्तु फाटक पर एक राक्षस ने उससे उस फल को छीन लिया। वह चरवाहा अपने बैल के पीछे-पीछे बाहर निकल आया।
 कालान्तर में वह चरवाहा उस स्थान पर गया और फल को अपने वस्त्रें में छिपाकर बाहर आने लगा; परन्तु जबतक वह आधे फाटक में ही था कि एक राक्षस उसके पास पहुँच गया। उस चरवाहे ने लाचार होकर उस फल को अपने मुख में डाल लिया और उसे समूचे निगल गया। इसपर उसका पेट फूलने लगा और अन्त में वह चट्टानों से सटकर गतिहीन हो गया। उस स्थान का राजा इस अद्भुत घटना को देखने आया; परन्तु वह उस चरवाहे को चट्टानों से अलग नहीं कर सका। क्रमशः वह चरवाहा पत्थर में परिणत होने लगा; परन्तु उसका मानव-शरीर ज्यों-का-त्यों बना रहा। वह पत्थर इतना कड़ा था कि उसे तोड़ना कठिन था। ह्वेनसांग को उस पत्थर में परिणत मानव-चरवाहे का अंग-प्रत्यंग की आकृति को दिखाया गया था।
 (5) इस गुफा का जब ब्रिटिश सरकार को पता लगा, तो उसने इस गुफा का अनुसंधान करने के लिए सामने की दक्षिणवाली सुरंग से गुफा के अंदर दो अंग्रेजों को भेजा, वे दोनों बहुत दूर गये और फिर कभी लौटकर नहीं आये और न उनका कुछ पता ही चला। तब से दक्षिण की ओर जानेवाली सुरंग को खतरनाक समझकर अंग्रेज सरकार ने बन्द करवा दिया, जो अभी तक बन्द है और सभी सुरंगों के द्वारा खुले हैं।
 पूरब तरफ की सुरंग में घुसने पर एक कमरा मिलेगा, जिसमें चबूतरा बना हुआ है। इस कमरे से दो रास्ते निकले हैं। एक पूरब की ओर गया है, जिसमें आप घुटनों एवं हाथों के बल जा सकते हैं। कुछ दूर इस तरह जाने पर एक कमरा मिलेगा। फिर उससे भी एक संकीर्ण मार्ग निकला है, जिसका पता नहीं है। दूसरा रास्ता दक्षिण की तरफ गया है। उस रास्ते से चलने पर एक चबूतरानुमा कमरा मिलेगा। फिर उस कमरे से रास्ता पूरब की तरफ गया है, जिसमें झुककर चलने पर पुनः एक चबूतरानुमा कमरा मिलेगा। उस कमरे से भी दो रास्ते निकले हैं, एक रास्ता पूरब की ओर और दूसरा दक्षिण की ओर गया है। पूरब की तरफ रेंगकर कुछ दूर चलने पर एक छोटा कमरा मिलेगा और दक्षिण की तरफ झुककर जाने पर एक बड़ा कमरा मिलेगा।
 पश्चिम की ओर गुफा में प्रवेश करने पर दो बड़े कमरे मिलेंगे। दूसरे कमरे के ठीक दक्षिण की ओर एक और बड़ा कमरा है। पश्चिम की ओर ढालू रास्ता होकर जाने पर एक बड़ा कमरा मिलेगा। उस कमरे में भी एक सुरंग है, जिसके बारे में कुछ पता नहीं है। थोड़ी दूर पश्चिम प्रवेश करने पर पुनः एक रास्ता सीधे उत्तर की ओर गंगा के किनारे तक गया है। इसमें प्रवेश करने के लिए थोड़ी सावधानी की आवश्यकता है। इसमें नीचे उतरने के लिए सीढ़ीनुमा रास्ता है। थोड़ी दूर जाने पर एक कूप (कुएँ) जैसा गड्ढा है। इसी से इस स्थान का नाम कुप्पाघाट पड़ा है। उसमें सीढ़ीनुमा रास्ते से उतरकर जाइये, फिर बैठकर एक कमरे में प्रवेश कीजिए और कुछ दूर झुककर चलिये। फिर बैठकर एक कमरे में प्रवेश कीजिए। उसी कमरे के बगल में पश्चिम तरफ एक कमरा है। उस कमरे की ऊँचाई कम है। इसी में अतिशय ध्यानाभ्यास करके महर्षिजी ने दिव्य-ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उस कमरे की बगल से एक रास्ता सीधे गंगा के किनारे तक चला गया है। पश्चिम बगल के कमरे से एक सुरंग सीधे पश्चिम की ओर गयी हैं, जिसके बारे में कुछ भी पता नहीं है। लोगों का कहना है कि इस सुरंग का लगाव मुंगेर की गुफा से है। दर्शक को चाहिए कि वे गुफा-प्रवेश-नियमावली को ठीक से जान लें, तब गुफा में प्रवेश करें।
गुफा-प्रवेश के नियम ,
 (1) गुफा के दर्शकगण रोशनी का प्रबन्ध स्वयं करें।
 (2) गुफा-प्रवेश के पूर्व आश्रम- व्यवस्थापक से अनुमति प्राप्त कर लें।
 (3) चप्पल-जूते बाहर खोलकर ही गुफा में प्रवेश करें। एक साथ दस दर्शकों से अधिक गुफा में प्रवेश नहीं करें।
 (4) महिलाएँ और बच्चे अभिभावक के साथ ही गुफा में प्रवेश करें।
 (5) गुफा के अन्दर दीवार में कुछ अंकित नहीं करें।
 (6) गुफा के अन्दर शोरगुल नहीं करें।
 (7) गुफा के अन्दर अवलोकन के अतिरिक्त अधिक समय नहीं ठहरें।
 (8) महिलाओं के लिए गुफा में ध्यानाभ्यास करना सर्वथा वर्जित है।
 (9) ध्यानाभ्यास के नियत समय में दर्शक- गण गुफा में प्रवेश नहीं करें।
 (10) गुफा-देखने का निर्धारित समय 7 बजे प्रातः से 9 बजे पूर्वाह्ण तक है। पुनः 4-00 बजे अपराह्ण से 5-00 बजे अपराह्णकाल तक है।
(ix) महर्षि मेँहीँ-साहित्यागार 
 आश्रम के मुख्य प्रवेश-द्वार के पश्चिम ओर गुफा की बगल में महर्षि मेँहीँ-साहित्यागार है। इस साहित्यागार से अखिल भारतीय संतमत-सत्संग महासभा द्वारा प्रकाशित पुस्तकों एवं तस्वीरों की बिक्री होती है। वी0पी0 द्वारा पुस्तक मँगानेवाले सज्जन को पुस्तक का अग्रिम मूल्य भेजना पड़ता है, तब पुस्तक यहाँ से भेजी जाती है। 
(x) प्रकाशन-स्टोर 
 जहाँ कहीं संतमत-सत्संग का जिलाधि- वेशन, अखिल भारतीय संतमत-सत्संग महाधिवेशन या मास-ध्यान-साधना शिविर होता है, वहाँ पुस्तक, तस्वीर आदि भेजी जाती हैं।
 इस आश्रम से प्रकाशित होनेवाली पुस्तकों की सूची इस प्रकार है-
 (1) सत्संग-योग (चारो भाग), (2) वेद-दर्शन-योग, (3) श्रीगीता-योग-प्रकाश, (4) सत्संग-सुधा (एक से चार भाग), (5) मोक्ष-दर्शन, (6) विनय-पत्रिका-सार सटीक, (7) भावार्थ- सहित घटरामायण-पदावली, (8) ज्ञान-योग-युक्त ईश्वर-भक्ति, (9) ईश्वर का स्वरूप और उसकी प्राप्ति, (10) महर्षि मेँहीँ-पदावली, (11) सन्तवाणी सटीक, (12) रामचरितमानस-सार सटीक, (13) महर्षि मेँहीँ वचनामृत (प्रथम खंड), (14) महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधा-सागर, (15) महर्षि मेँहीँ की शिक्षाप्रद कहानियाँ, (16) राजगीर- हरिद्वार-दिल्ली-सत्संग, (17) महर्षि मेँहीँ-वचनामृत, (18) महर्षि मेँहीँ के दिनचर्या-उपेदश, (19) महर्षि मेँहीँ-चरित, (20) अमीघूँट, (21) महर्षि संतसेवी ज्ञान-गंगा, (22) योग-माहात्म्य, (23) ओ3म्- विवेचन, (24) जग में ऐसे रहना, (25) लोक-परलोक-उपकारी, (26) सुख-दुःख, (27) सत्य क्या, (28) सुषुम्ना ध्यान, (29) जिज्ञासा- समाधान, (30) संतमत में साधना का स्वरूप, (31) साधना में सफलता कैसे, (32) जे पहुँचे ते कहि गये, (33) परमात्म-दर्शन, (34) परमात्म भक्ति, (35) अध्यात्म-विवेचन, (36) महाप्राज्ञ महर्षि संतसेवी अभिनन्दनग्रंथ, (37) महर्षि संतसेवी की बोध कथाएँ, (38) गुरु-महिमा, (39) पूर्ण सुख का रहस्य, (40) अंतर अजब विलास, (41) त्यागो जगत की आस, (42) अंत मति सो गति, (43) रहना नहिं देश विराना है, (44) या देही का गर्व न कीजै, (45) जीना किसका सफल है, (46) संतमत-भजनमाला, (47) ज्ीम च्ीपसवेवचील वि स्पइतंजपवद, (48) म्ेेमदबम वि ळपजं ल्वहं आदि।
(xi) सत्संग-मंदिर 
 महर्षि मेँहीँ-साहित्यागार के पश्चिम की ओर एक विशाल; परन्तु कम ऊँचाई का मनोरम भवन है। यही पुराना सत्संग-मंदिर है, जिसमें एक बड़ा हॉल है। हॉल दो भागों में बँटा हुआ है। पूरबवाले भाग में महिलाएँ और पश्चिमवाले भाग में पुरुषों के बैठने की व्यवस्था है। इस हॉल में एक काँच का भव्य चबूतरा बना हुआ है, जिसके ऊपर रखी कुर्सी पर सोवियत संघ, यूरोप के भक्त द्वारा दी गयी महर्षिजी की तस्वीर रखी हुई है। सत्संग- मंदिर के पश्चिम एक मकान में दो कमरे हैं, जिनमें स्वामी कमलानन्द बाबा निवास करते हैं। मंदिर में ठहरनेवाले को मंदिर की नियमावली का पालन करना अनिवार्य है।
अखिल भारतीय संतमत-सत्संग महासभा के उद्देश्य ये हैं-
 (1) मनुष्य मात्र के ऐहिक एवं पारमार्थिक कल्याण के लिए संतमत-सत्संग का प्रचार करना।
 (2) वेद-शास्त्र, उपनिषद् तथा संत- वाणियों के आधार पर धर्मोपदेश करके संतमत- सिद्धांत की पुष्टि करना।
 (3) सत्संग-मंदिरों की स्थापना करके उनकी मर्यादा की रक्षा करना या करवाना।
 (4) आध्यात्मिक सद्ग्रन्थों, पुस्तिकाओं, पत्रिकाओं आदि के द्वारा संतमत-सत्संग का प्रचार करना।
 (5) दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, वार्षिक तथा विशेषाधिवेशन एवं मास-ध्यान-साधना आदि के द्वारा सत्संग के उद्देश्य की पुष्टि करना। 
 (6) सत्य पर आधारित किसी भी सम्प्रदाय, पंथ या मत का पक्षपात या विरोध नहीं करना।
 इसका एक अखिल भारतीय संगठन है, जिसके अधीन प्रान्तीय संगठन और जिला-संगठन आदि कार्य करते हैं। जिला-स्तर से ग्राम-स्तर तक सत्संग-मंदिरों और सदस्यों के माध्यम से इसका कार्य-संचालन होता है। इसकी एक महासभा और कार्यकारिणी समिति है और इसके मनोनीत और निर्वाचित पदाधिकारी हैं। महासभा की कार्यकारिणी के सदस्य वे ही व्यक्ति बनते हैं, जो जिला कार्यकारिणी के सदस्य होते हैं। उनके कर्त्तव्य, अधिकार और कार्यावधि निर्धारित हैं। नियम-विरुद्ध कार्य करनेवाले व्यक्तियों और संगठनों के लिए दंड का विधान है। अनुदान ही इसके आर्थिक ढाँचे की रीढ़ है।
(xii)  शान्ति-सन्देश-कार्यालय एवं प्रेस 
 आश्रम में ‘शान्ति-सन्देश’ मासिक पत्रिका का कार्यालय है और शान्ति-सन्देश प्रेस कार्यालय भी है। यह उत्तर की ओर गंगा किनारे अवस्थित है। आश्रम से निकलनेवाली ‘शान्ति-सन्देश’ पत्रिका का मुख्य उद्देश्य है-मानव मात्र तक महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज एवं अन्य संत-महात्माओं के उपदेशों को पहुँचाना। इस पत्रिका में सर्वप्रथम सूक्तिकण-संत-ऋषि-महात्माओं की चुनी हुई वाणियाँ रहती हैं। फिर किन्हीं संत का पद्य रहता है। इसके बाद परमाराध्य संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज द्वारा विभिन्न जगहों पर दिये गये प्रवचनों में से कोई एक प्रवचन, उसके बाद पूज्यपाद महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज का प्रवचन एवं संतमत के वर्तमान आचार्य महर्षि हरिनन्दन परमहंसजी महाराज के प्रवचन तथा अन्य महात्माओं एवं विद्वानों के लेख प्रकाशित होते हैं। इस पत्रिका का प्रकाशन सर्वप्रथम खगडि़या, उसके बाद राष्ट्र निर्माता प्रेस, पूर्णियाँ तत्पश्चात् भागलपुर के एलाइड प्रेस में होता था। 1966 ई0 से आश्रम में ही छपाई का मशीन बैठाकर ‘शान्ति-सन्देश’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। बाद में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज एवं अन्य महात्माओं की रचित पुस्तकों का प्रकाशन होने लगा।
 इस प्रेस के द्वारा सत्संग-विज्ञापन, पोस्टर, निमंत्रण-पत्र, रसीद-बुक आदि की भी छपाई उत्तम ढंग से की जाती है। ‘शान्ति-सन्देश’ पत्रिका प्रत्येक मास की दस तारीख को प्रकाशित होती है।
 पत्रिका का ग्राहक बन जाने पर आप घर बैठे संत-महात्माओं के प्रवचन को पढ़-सुन सकते हैं। पत्रिका का आजीवन ग्राहक बनने के लिए 700/रुपये (सात सौ रुपये) एवं वार्षिक ग्राहक बनने के लिए 60/रुपये (साठ रुपये) जमा करने पड़ते हैं। आजीवन ग्राहक बन जाने पर पत्रिका 15 वर्ष तथा वार्षिक ग्राहक बनने पर एक वर्ष तक भेजी जाती है। शुल्क सीधे कार्यालय में जमा कर या मनीऑर्डर द्वारा भेजकर ग्राहक बन सकते हैं। तीन माह या छह माह के लिए ग्राहक नहीं बनाया जाता है।
 ‘शान्ति-सन्देश’ पत्रिका के संपादन का कार्य प्रो0 डॉ0 गुरु प्रसाद बाबा (सम्पादक एवं प्रकाशक) कर रहे हैं और प्रेस-प्रबंधक स्वामी स्वरूपानन्द बाबा हैं। इस प्रेस एवं ‘शान्ति-सन्देश’ पत्रिका पर स्वामित्व अखिल भारतीय संतमत-सत्संग महासभा का है। 
(xiii) आश्रम के मुख्य पेड़-पौधे 
 गुलचीन-महर्षि मेँहीँ-निवास के सामने पूरब गंगा के किनारे सीमा-दीवार के पास में एक चौड़ा पत्ता वाला छोटा वृक्ष है, उसी को गुलचीन कहते हैं।
 महर्षिजी इस वृक्ष की छाल का काढ़ा बनवाते थे। काढ़ा बनाने का तरीका यह था कि वृक्ष की पाव भर छाल दो किलो पानी में लेकर मिट्टी के बर्तन में गोयठे या लकड़ी की आग पर जलायी जाती थी। जब वह आधा किलो बच जाता था, तब छाल को मथकर फेंक दिया जाता था और पुनः पानी को जलाकर पाव भर के लगभग किया जाता था। इस तरह बने काढ़े को किसी बोतल में रख लिया जाता था और खाली पेट सुबह आधा चम्मच पीते थे। उनका कहना था कि इससे खून साफ होता है। खून साफ करने की यह बड़ी कारगर दवा है। गुलचीन के पौधे कई प्रकार के होते हैं, जिनमें श्वेत, लाल सुगन्धित पुष्प आते हैं।
 कौरव-पाण्डव-महर्षि मेँहीँ-निवास के प्रवेश-द्वार पर जो लता है, उसमें जो फूल लगता है, उसे कौरव-पाण्डव कहते हैं। यह बड़ा विलक्षण सुगंधित फूल है। इस फूल का अवलोकन करने पर पाएँगे कि उसके ऊपर तीन बड़े-बड़े केसर (रेशे) हैं, जो पाण्डु, धृतराष्ट्र एवं विदुर के प्रतीक हैं।
 उसके नीचे फिर पाँच पत्तियाँ हैं, जो पाँचो भाई पाण्डवों के द्योतक हैं और फिर नीचे लगभग एक सौ केसर हैं, जो सौ भाई कौरवों के द्योतक हैं। महर्षिजी इस लता की निगरानी किया करते थे; जाड़े के महीने में यह लता मुरझा जाती है, ज्यों-ज्यों गर्मी आती है, त्यों-त्यों यह हरी-भरी होने लगती है। 
 ताड़ वृक्ष-महर्षि मेँहीँ आश्रम के प्रवेश-द्वार के सामने सीढ़ी के पास (जहाँ घास से ‘महर्षि मेँहीँ आश्रम’ लिखा हुआ है) दो ताड़ वृक्ष हैं। वे एक साथ जन्म लेकर एक समान ही बढ़ते जा रहे हैं। दोनों की ऊँचाई बराबर है। दोनों में कभी फल नहीं लगे हैं। दोनों वृक्ष में ऊपर पीपल की लत्तर छायी हुई है। पीपल को सुखाकर खाने से खाँसी ठीक हो जाती है।
 मौलसिरी-ताड़ वृक्ष की बगल में पश्चिम तरफ एक छोटे पत्तों वाला विशाल वृक्ष है, यही मौलसिरी का वृक्ष है। इसकी जड़ को घेरते हुए पक्के का एक चबूतरा बना दिया गया है, जिसपर
आगन्तुक बैठते हैं।
 महर्षिजी मौलसिरी की छाल का काढ़ा बनवाकर कुल्ला करते थे। उनका कहना था कि इसके काढ़े से कुल्ला करने पर दाँत बहुत मजबूत हो जाते हैं। इसलिए कोई-कोई इसे वज्रदन्ती भी कहते हैं। इसमें छोटे-छोटे बहुत सुगन्धित फूल लगते हैं। लोग इसके पुष्पों को चुनकर माला बनाते हैं। इसके पुष्पों से बनी माला बहुत दिनों तक सुगन्ध देती है।
 शिवलिंगी-आश्रम के बीच कुएँ और पानी टंकी के पास एक ऊँचा वृक्ष है, उसी को शिवलिंगी कहते हैं। इसमें नये-नये तने निकलते रहते हैं। इन्हीं तनों में फूल लगते हैं। इस फूल का अवलोकन करने पर पाएँगे कि उसमें जलढरी पर शिवलिंगी जैसा ढाँचा है, जिसपर अनेक फणों वाले सर्प की आकृति छायी हुई है। फण-जैसी आकृति का थोड़ा भी अंश मुँह में डालेंगे, तो नशा आ जाएगा। इस वृक्ष में बेल के समान बड़े-बड़े फल लगते हैं।
(xiv) महर्षि मेँहीँ एवं गंगा नदी
 महर्षि मेँहीँ ने जिस समय यहाँ फूस की कुटिया बनायी थी, उस समय गंगा नदी बहुत उत्तर की ओर हटकर बह रही थी। जब महर्षिजी इस कुटिया में निवास करने लगे, तब गंगा नदी कुटिया के निकट आ गयी। महर्षिजी कुटिया छोड़कर कुछ दिनों के लिए अन्यत्र चले गये, तब गंगा नदी भी पूर्ववत् दूर हटकर बहने लगी।
 कुछ दिनों के पश्चात् महर्षिजी पुनः यहाँ आए, तो गंगा भी पुनः निकट आ गई। तब से अभी तक गंगा नदी ज्यों-की-त्यों प्रवाहित हो रही है।
 महर्षिजी प्रायः गंगा-स्नान करने जाया करते थे। उनका गंगा में स्नान करने जाना मानो अपने त्रय लोक पावन चरणकमलों से उसको पवित्र करना था। उस दिन गंगा वर्षों के सँजोये अपने अरमानों को पूरा होते देख अपने भाग्य पर इठलाती होगी। महर्षिजी खान-पान एवं स्नान में गंगाजल का ही उपयोग करते थे।

(xv) महर्षि मेँहीँ -समाधि मंदिर 
 महर्षि मे ँही ँ आश्रम, कुप्पाघाट के संस्थापक सद्गुरु महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज ने इहलोक की लीला समाप्त कर दिनांक 08 जून 1986 को परिनिर्वाण प्राप्त किया। उनके पार्थिव शरीर को फूल-मालाओं से सजाकर दो दिनों तक श्रद्धालु भक्तों के अन्तिम दर्शनार्थ बर्फ पर रखा गया था। महर्षिजी के महाप्रयाण के बाद सर्वसम्मति से उनकी सेवा में छाया की भाँति रहनेवाले प्रधान शिष्य महर्षि संतसेवी परमहंस ने चिता प्रज्ज्वलित की। 
 सर्वप्रथम वैदिक मंत्रें द्वारा हवन किया गया, तत्पश्चात् चिता में अग्नि प्रज्वलित की गई। 
 जिस स्थान पर उनके अग्नि संस्कार किए गए वहाँ आज लगभग 60 फीट ऊँचा भव्य समाधि-मंदिर बनाया गया है। मंदिर के अंदर मध्य भाग में ग्रेनाइट पत्थरों से एक अष्टकोणीय चबूतरा बना हुआ है। वर्तमान समय में उसपर गुरुदेव का ध्यानस्थ चित्र स्थापित है। समाधि-मंदिर की जमीन पर संगमरमर पत्थर जड़ा है। इसके सोलह पायों में ग्रेनाइट पत्थर लगाए गए हैं। अंदर का भाग शीशे की किवाड़ों से घिरा शोभायमान हो रहा है। मंदिर के भीतर और बाहर संगमरमर पत्थरों पर महर्षिजी की अमर-वाणियाँ उकेरी गई हैं। मंदिर के शिखर पर कमल की-सी आकृति बनी है। जिसमें पीतल के कलश रखे गए हैं। उसपर खड़ा त्रिशूल दूर से ही दृष्टिगोचर होता है। समाधि मंदिर के चारों ओर खिले- अधखिले फूलों की कतार और वहाँ की शांति-पवित्रता से आकर्षित होकर दर्शकगण अपना सुध-बुध खो देते हैं।
(xvi)  स्वामी श्रीधर जी महाराज का समाधि-स्थल
 स्वामी श्रीधरदासजी महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज के आरंभिक शिष्यों में प्रमुख स्थान रखते हैं। इनका जन्म 1889 ई0 में समस्तीपुर जिला के लगमा ग्राम के एक क्षत्रिय कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीजगदम्बी सिंह था। 1920 ई0 में इन्हें महर्षिजी के प्रथम दर्शन हुए। 1928 ई0 में इन्होंने महर्षिजी से दीक्षा प्राप्त कर ध्यान-साधना शुरू की। कुछ समय बाद ये महर्षिजी के साथ सत्संग कार्यक्रम में भाग लेने लगे। महर्षिजी जब मायागंज की गुफा में ध्यानरत रहते थे, उस समय भी ये उनकी सेवा के लिए साथ में थे। इनकी सेवा से प्रसन्न होकर महर्षिजी ने इन्हें सिकलीगढ़ धरहरा का व्यवस्थापक बना दिया और बाद में इन्हें संन्यासी वस्त्र देकर दीक्षा देने का आदेश भी दे दिया। 97 वर्ष की अवस्था में दिनांक 26 जनवरी 1987 ई0 को इन्होंने अपने पंच-भौतिक शरीर का त्याग कर दिया। आश्रम आहाते के पश्चिम-उत्तर भाग में पूर्ण सम्मान के साथ इनकी चिता रची गई। आज उनकी याद में उसी स्थान पर एक छोटा किन्तु सुंदर समाधि मंदिर खड़ा है।
(xvii)  महर्षि संतसेवी समाधि-स्थल
 सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज की समाधि से सटे दक्षिण-पश्चिम में महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज की समाधि बहुत आकर्षक है। इसका निर्माण राजस्थान के मकराना से लाए गए पत्थरों से किया गया है। मकराना में ही कलात्मक ढंग से पत्थरों को काट कर यहाँ लाया गया और राजस्थानों के कलाकारों द्वारा सर्वधर्म-समन्वय के रूप में इसे सजाया गया है। इस समाधि में एक भी ईंट का प्रयोग नहीं किया गया है। समाधि-मंदिर का उद्घाटन 20 दिसम्बर, 2009 ई0 को संतमत के वर्तमान आचार्य पूज्यपाद महर्षि हरिनन्दन परमहंसजी महाराज के कर-कमलों द्वारा किया गया।