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दैनंदिनी/कैलेंडर

(संतमत सत्संग आश्रम कुप्पाघाट, भागलपुर, बिहार, भारत )

 महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट, भागलपुर में पाँच उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाये जाते हैं-

(1) संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ-जयन्ती

(2) गुरु-पूर्णिमा

(3) संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ-परिनिर्वाण दिवस और महर्षि संतसेवी परिनिर्वाण दिवस

(4) महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज की जयंती

(5) महर्षि हरिनन्दन परमहंसजी महाराज की जयंती



(1) महर्षि मेँहीँ-जयन्ती-जिस प्रकार समय पाकर सरोवर में सरसिज होकर अपने सौरभ में संसार को सुरभित करते हैं, उसी प्रकार समय-समय पर सन्तगण धराधाम पर अवतीर्ण होकर अपने ज्ञानलोक से लोक को आलोकित करते रहे हैं। उन्हीं सन्तों की परम्परा में हमारे सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज थे। उनका अवतरण इस धरा- धाम पर 28-04-1885 ई0 के वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी मंगलवार को हुआ था। इस पवित्र दिन महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट, भागलपुर को विशेष रूप से सजाया जाता है। महर्षिजी ने इसी आश्रम में परम सिद्धि की प्राप्ति की थी।
 जन्मोत्सव के दिन ट्रक पर महर्षिजी की भव्य तस्वीर को फूल-मालओं से सजाकर बाजे-गाजे के साथ हजारों नर-नारी नगर की प्रभातफेरी करते हैं। कई तरह के नारे लगाते हुए गुरु महाराज का जयघोष करते हैं।
 प्रभातफेरी से लौटने के बाद प्रातःकालीन स्तुति-प्रार्थना एवं ग्रंथपाठ होता है। फिर महर्षिजी की तस्वीर पर श्रद्धालु भक्त पुष्पमाला, फल, मिष्टान्न, रुपये आदि निवेदित करते हैं। सद्गुरु प्रसाद के बिना कोई भी अपना परमार्थ सिद्ध नहीं कर सकता। गुरु-भक्त के लिए गुरु और उपास्य एक होते हैं। संत ज्ञानेश्वर और संत एकनाथ ने गुरु-मूर्ति में ही भगवान के दर्शन किये थे। गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं और परब्रह्म परमात्मा ही गुरु के सगुण रूप में साधक को कृतार्थ करते हैं। गुरु-प्रसाद के बिना कोई साधक कभी कृतार्थ नहीं हुआ। गुरु बोलते-चलते ब्रह्म हैं। जन्म-दिवस को विशेष रूप से भंडारे का भी इन्तजाम रहता है। हजारों नर-नारियों, बच्चे एवं दरिद्रनारायण भोजन करते हैं। इस तिथि को आश्रम में नये-नये कपड़े बाँटे जाते हैं।
 पुनः दो बजे से भजन-कीर्तन के साथ सत्संग प्रारम्भ होता है, जिसमें महर्षिजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला जाता है। आरती के बाद कार्यक्रम समाप्त हो जाता है। समाप्ति के समय प्रसाद वितरण किया जाता है। 
(2) गुरु-पूर्णिमा-यह पूर्ण गुरु का परिचायक है और ‘पूरे गुरु’ की याद दिलाती है। संसार में जितने प्रकार के धर्म, पंथ, सम्प्रदाय, मजहब आदि हैं, सबमें अपने-अपने ढंग के पर्व और त्योहार हुआ करते हैं। उन पर्व-त्योहारों की अपनी-अपनी विशेषताएँ भी होती हैं। शैव के लिए शिवरात्रि, मुसलमान के लिए मुहर्रम, ईसा के लिए क्रिसमस-डे, इसी भाँति गुरु में भक्ति रखनेवाले के लिए गुरु-पूर्णिमा एक पावन पर्व है। आषाढ़ पूर्णिमा को जगद्गुरु-व्यासदेवजी का जन्म इस धराधाम पर हुआ था। उनके शरीर का वर्ण श्याम यानी कृष्ण था और उनका जन्म एक द्वीप में हुआ था। इसी हेतु उनको कृष्ण द्वैपायन भी कहते हैं। वे बड़े ज्ञानी और ध्यानी थे। आज उनका पार्थिव शरीर हमारे बीच नहीं है; किन्तु उनके गुरुत्व का परिचय उनकी रचनाएँ देती हैं।
 स्थूलकाय महाभारत, अठारहो पुराण आदि की रचना वेदव्यास ने ही की है। वे संसार को ज्ञान देनेवाले कहलाये। इसलिए संसार के लोग उनको गुरु मानते हैं। इसीलिए उनकी जन्मतिथि (आषाढ़-पूर्णिमा) को गुरु-पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन सभी वैदिक धर्मावलम्बियों अपने-अपने गुरु की पूजा बड़ी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ फूल, फल, मिष्टान्न आदि के द्वारा करते हैं।
 उस दिन महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट, भागलपुर को भी विशेष रूप से फूल-पत्तियों, विद्युत-प्रकाशों से एवं कपड़े का गेट बनाकर सजाया जाता है। प्रातःकालीन सत्संग के बाद लोग फूल, फल, मिष्टान्न, रुपये आदि महर्षिजी की तस्वीर पर चढ़ाते हैं। आश्रम की ओर से हजारों गरीब बच्चों, सत्संग-प्रेमियों आदि को विशेष रूप से भोजन कराया जाता है। अपराह्णकालीन सत्संग करीब ढाई बजे से कीर्तन-भजन के साथ प्रारम्भ होता है।
 सत्संग में साधु-महात्मा एवं विद्वान लोग गुरु की महिमा-विभूति पर प्रकाश डालते हैं। सत्संग-समाप्ति के बाद प्रसाद का वितरण होता है तथा कार्यक्रम समाप्त हो जाता है।
(3) महर्षि मेँहीँ-परिनिर्वाण-दिवस-भारत की धरती प्राचीनकाल से साधु-संतों की चरणधूलि से सुशोभित होती रही है। उनका पार्थिव शरीर तो छूट जाता है; परन्तु उनका नाम अमर हो जाता है। साथ ही उनकी वाणी भी अमर हो जाती है, जो लोकहित के लिए परमोपयोगी होती है।
 मृत्यु भी एक पड़ाव ही है। साधारण मानव उस पड़ाव से पुनः चलते हैं; लेकिन महामानव उस पड़ाव पर ही रुक जाते हैं। वे तो शरीररूपी कपड़े को उतारकर अविचल (शाश्वत) सुख-शान्तिमय पद में विलीन हो जाते हैं, जहाँ से पुनः चलना नहीं होता। महर्षिजी भी उसी अविचल धाम में चले गये हैं, रह गयी है उनकी यशगाथा।
 परमाराध्य प्रातःस्मरणीय अनन्त श्रीविभूषित सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज दिनांक 08-06-1986 ई0, रविवार तदनुसार विक्रमी संवत् 2043 के ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को इस पार्थिव शरीर को 101 वर्ष 1 महीना 11 दिन की अवस्था में परित्याग कर ब्रह्मलीन हो गये। इस दिन कुप्पाघाट, भागलपुर में 24 घंटे का ध्यानाभ्यास होता है और 24 घंटे महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज द्वारा रचित ग्रंथों का पाठ होता है। इस कार्यक्रम को आश्रमवासी समय बाँट-बाँटकर पूरा करते हैं। समाप्ति के दिन भंडारा होता है। अपराह्णकाल में सत्संग का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु-भक्त उनके किये गये उपकार पर प्रकाश डालकर उनके श्रीचरणों (तस्वीर के सामने) में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सत्संग-समाप्ति के बाद प्रसाद-वितरण किया जाता है।
(4) महर्षि संतसेवी-परिनिर्वाण-दिवस- महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज ने 4 जून, 2007 ई0 को पार्थिव शरीर का परित्याग कर दिए। प्रत्येक वर्ष 4 जून को परिनिर्वाण-दिवस महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट, भागलपुर में धूम- धाम से मनाया जाता है। 
(5)  महर्षि संतसेवी-जयंती-आत्मा अपनी अभिव्यक्ति के लिए जो बाह्य शरीर धारण करती है, वही रूप कहलाता है। परम पूज्य महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज का रूप उसी आत्मा का प्रतीक है।
 महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज का अवतरण 20 दिसम्बर, 1920 ई0 को मधेपुरा जिले के गम्हरिया ग्राम में हुआ था। बचपन से ही इनमें साधु-महात्मा के लक्षण दीखने लगे थे। आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए सद्गुरु की खोज कर ही रहे थे कि मार्च, 1939 ई0 में कनखुदिया गाँव में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज के दर्शन हुए। आपने उनसे दीक्षा ली। कुछ दिन उनके साथ रहे, फिर उनके आदेशानुसार अपनी वृद्धा माँ की देखभाल करते हुए अध्यापन-कार्य कर स्वावलम्बी जीवन बिताया। माता के देहान्त के उपरान्त 1949 ई0 से आपने गुरु की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर दिया। भारत के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता, जिसमें इतनी लम्बी अवधि तक किसी ने अपने गुरु की सेवा की हो।
 आपकी गुरु-सेवा चिरस्मरणीय रहेगी। इसी गुरु-सेवा को देखकर लोग आपकी भी जयन्ती मनाने लगे। प्रत्येक वर्ष 20 दिसम्बर को सोल्लास आपकी जयन्ती मनायी जाती है। महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट, भागलपुर को फूल-पत्तियों आदि से सजाया जाता है। प्रातःकालीन सत्संग के बाद लोग फूल, फल, मिष्टान्न, रुपये आदि महर्षि संतसेवीजी की तस्वीर पर चढ़ाते हैं। दोपहर में हजाराें नर-नारियों को भोजन कराया जाता है। आश्रमवासियों के बीच नये वस्त्र बाँटे जाते हैं। अपराह्णकालीन सत्संग दो बजे से आयोजित किया जाता है, जिसमें उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर साधु-महात्मा तथा विद्वान लोग प्रकाश डालते हैं। आरती के बाद सत्संग का कार्यक्रम समाप्त हो जाता है। सत्संग-समाप्ति के समय प्रसाद-वितरण होता है।
(6) वर्तमान आचार्यश्री की जयन्ती-वर्तमान आचार्य महर्षि हरिनन्दन परमहंसजी महाराज का जन्म 23 मार्च, 1934 ई0 तदनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी के दिन सुपौल जिलान्तर्गत त्रिवेणीगंज प्रखंड के मचहा ग्राम में हुआ। इनके पिता श्रीकलानन्द यादव एवं माता श्रीमती सुखिया देवी धर्मपरायणा थीं। तीव्र वैराग्य के कारण 1957 ई0 में माँ की ममता और बहन-भाई के प्यार को त्यागकर महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज की सेवा में अपने को छाया की भाँति समर्पित कर दिया। 1957 ई0 से 8 जून, 1986 ई0 तक आप अपने गुरु की सेवा में संलग्न रहे। संतमत के इतिहास में आपकी गुरु-सेवा सदा चिरस्मरणीय बनी रहेगी।
 प्रत्येक वर्ष चैत्र शुक्लपक्ष अष्टमी के दिन आपकी पावन जयंती पैतृक गृह (पावन जन्मभूमि) ग्राम-मचहा, प्रखंड-त्रिवेणीगंज, जिला-सुपौल में बृहत् पैमाने पर मनायी जाती है। इस दिन महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट, भागलपुर में भी सत्संग एवं भण्डारे का आयोजन होता है।