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संतमत साधना के सोपान

ध्यान -योग का साधक संशय में नहीं रहता है। वह ध्यानाभ्यास के प्रयोग से जो कुछ पाता है, उसको सत्य मानता है और त्रुटि-विहीन ध्यानाभ्यास  के प्रयोग में जो नहीं पाया जाता है, उसको असत्य मानता है। उसको संशय कैसा? - सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज

दृष्टि- अभ्यास के बाद शब्द-अभ्यास करो। भजन के समय सब ख्यालों का विर्सजन कर बैठो। भाव- शून्य होकर बैठो। गुरु के बताए निसाने पर अपने को लगाओ। भावना करते हुए जो बैठता है, वह भावना के अनुकूल होता है। इसलिए भावना को छोड़ो।  - बाबा साहब 

सदाचरण

साक्षात्कार