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सद्गुरु सद्ग्रंथ

(संतमत सत्संग आश्रम कुप्पाघाट, भागलपुर, बिहार, भारत )

सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज की अमूल्य कृतियाँ 

 (1) संतमत-सिद्धान्त और गुरु-कीर्तन- महर्षिजी द्वारा रचित यह उनकी पहली पुस्तक है। यह 1926 ई0 में युनाइटेड प्रेस, भागलपुर से प्रकाशित हुई थी। इसमें कविताएँ, सन्तमत-सिद्धान्त, संतमत की परिभाषा आदि हैं।
 (2) रामचरितमानस-सार सटीक-संत कवि मेँहीँ की यह दूसरी रचना है। यह 1930 ई0 में भागलपुर, बिहार प्रेस से प्रकाशित हुई थी। इसमें गोस्वामी तुलसीदासजी के रामचरितमानस के 152 दोहों और 951 चौपाइयों की व्याख्या की गयी है। इसका मुख्य लक्ष्य है-स्थूल भक्ति और सूक्ष्म भक्ति के साधनों को प्रकाश में लाना।
 (3) विनय-पत्रिका-सार सटीक-यह तीसरी रचना 1931 ई0 में भागलपुर के युनाइटेड प्रेस में छपी थी। इसमें गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज रचित ‘विनय-पत्रिका’ के कुछ पदों की सरल व्याख्या की गई है।
 (4) भावार्थ-सहित घटरामायण- पदावली-महर्षिजी की यह चौथी रचना है। इसका प्रकाशन सर्वप्रथम 1935 ई0 में युनाइटेड प्रेस, भागलपुर से हुआ था। इसमें संत तुलसी साहब की पुस्तक ‘घटरामायण’ के 7 छन्दों, 3 सोरठों, 3 चौपाइयों, एक दोहे और एक आरती का भावार्थ दिया गया है।
 (5) सत्संग-योग (चारो भाग)- महर्षिजी की यह पाँचवीं रचना है। इसमें सूक्ष्म भक्ति का निरूपण वेद, शास्त्र, उपनिषद्, उत्तर- गीता, गीता, अध्यात्म-रामायण, महाभारत, संतवाणी और आधुनिक विचारकों के विचारों द्वारा किया गया है। इसके स्वाध्याय और चिन्तन-मनन से अध्यात्म-पथ के पथिकों को सत्पथ मिल जाता है। इसका प्रकाशन सर्वप्रथम 1940 ई0 में हुआ था।
 (6) महर्षि मेँहीँ-पदावली- यह महर्षि मेँहीँ की छठी पुस्तक है। इसका रचना-काल 1925 से 1950 ई0 है। यह महर्षिजी की बड़ी लोकप्रिय काव्य-कृति है। इसमें 142 पद हैं। इसके पदों का वर्गीकरण विषय के आधार पर किया गया है। परम प्रभु परमात्मा, सन्तगण और मार्गदर्शक सद्गुरु, इन तीनों को एक ही के तीन रूप समझकर इन तीनों की स्तुति-प्रार्थनाओं को प्रथम वर्ग में स्थान दिया गया है । 
द्वितीय वर्ग में सन्तमत के सिद्धान्तों का एकत्रीकरण है। तृतीय वर्ग में प्रभु-प्राप्ति के एक ही साधन ‘ध्यान-योग’ का संकलन है, जो मानस जप, मानस ध्यान, दृष्टि-साधन और नादानुसंधान या सुरत-शब्द-योग का अनुक्रमबद्ध संयोजन-सोपान है। चतुर्थ वर्ग में ‘संकीर्त्तन’ नाम देकर तद्भावानुकूल गेय पदों के संचयन का प्रयत्न है। पंचम वर्ग में आरती उतारी गई है अर्थात् उपस्थित की गई है।
साधकों की सुविधा का ख्याल करके नित्य प्रति की जानेवाली स्तुति-प्रार्थनाओं, सन्तमत- सिद्धान्त एवं परिभाषा आदि को प्रारम्भ में ही अनुक्रम-बद्ध कर दिया गया है और उसे स्तुति-प्रार्थना का अंग मानकर उसी वर्ग में स्थान दिया गया है।
 (7) सत्संग-सुधा, प्रथम भाग- यह महर्षिजी की सातवीं पुस्तक है। इसमें उनके 18 प्रवचनों का संकलन है। इसका प्रथम प्रकाशन 1954 ई0 में हुआ था।
 (8) श्रीगीता-योग-प्रकाश- गीता के सच्चे भेद को इस रचना में उद्घाटित किया गया है। इसका प्रथम प्रकाशन सन् 1955 ई0 में हुआ था। इस पुस्तक में एक स्थल पर महर्षिजी कहते हैं-‘समत्वयोग प्राप्त कर, स्थितप्रज्ञ बन कर्म करने की कुशलता या चतुराई में दृढ़ारूढ़ रह कर्त्तव्य कर्मों के पालन करने का उपदेश गीता देती है।’
 (9) वेद-दर्शन-योग- यह महर्षिजी की नौवीं कृति है। इसमें चारो वेदों से चुने हुए एक सौ मंत्रें पर टिप्पणी लिखकर संतवाणी से उनका मिलान किया गया है। इसका प्रथम प्रकाशन 1956 ई0 में हुआ था।
 (10) सत्संग-सुधा, द्वितीय भाग- इसका प्रथम प्रकाशन 1964 ई0 में हुआ था। इसमें भी उनके 18 प्रवचनों का संकलन है। सत्संग-सुधा के दोनों भागों के अध्ययन से पाठकों को यह बोध होगा कि वेदों, उपनिषदों, गीता, सन्तवाणियों में सदा से ईश्वर-स्वरूप उसके साक्षात्कार करने की सद्युक्ति एवं अनिवार्य सदाचार-पालन के निर्देश बिल्कुल एक ही हैं।
 (11) संतवाणी सटीक-इसमें 31 सन्त- कवियों के चुने हुए पदों की व्याख्या महर्षिजी ने की है। इसका प्रथम प्रकाशन 1968 ई0 में हुआ था।
 (12) ईश्वर का स्वरूप और उसकी प्राप्ति- इसका प्रथम प्रकाशन 1963 ई0 में हुआ था। इसमें ईश्वर के स्वरूप का निरूपण किया गया है। ईश्वर का स्वरूप कैसा है, उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? इसका विशद विश्लेषण इसमें किया गया है। यह पूर्णियाँ जिले के डोभा गाँव में 1950 ई0 में उनका दिया गया प्रवचन है।
 (13) ज्ञान-योग-युक्त ईश्वर की भक्ति- इसका रचना-काल 1970 ई0 है। इसमें बतलाया गया है कि परमात्मा को प्राप्त करने के लिए ज्ञान-योग और भक्ति का समन्वय परमावश्यक है। किसी एक के अभाव में साधना पूर्ण नहीं हो सकती।
 (14) मोक्ष-दर्शन- इसका प्रथम प्रकाशन 1967 ई0 में हुआ था। इसमें महर्षिजी ने सूत्र-रूप में प्रभु, माया, ब्रह्म, प्रकृति, जीव, अन्तस्साधना, परमपद, सद्गुरु, प्रणवनाद आदि का सुन्दर और सरल विवेचन किया है। उन्होंने बतलाया है कि सुरत-शब्द-योग किये बिना परमात्मा को प्राप्त करना असम्भव है।
 (15) महर्षि मेँहीँ-वचनामृत (प्रथम भाग)- इसका रचनाकाल 1989 ई0 है। इसमें 16 प्रवचनों का संकलन है।
 (16) सत्संग-सुधा, तृतीय भाग- 2001 ई0। इसमें 18 प्रवचनों का संकलन है।
 (17) सत्संग-सुधा, चतुर्थ भाग- 2003 ई0। इसमें 26 प्रवचनों का संकलन है।
 (18) महर्षि मेँहीँ-सुधा-सागर- 2004 ई0। इसमें 323 प्रवचनों का संकलन है।