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संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ 


संतमत के आधार स्तम्भ एवं 20 वीं सदी के महान संत महर्षि मेँहीँ का

आविर्भाव      : 28-04-1885 ई0, मंगलवार

महाप्रयाण   : 08-06-1986 ई0, रविवार

संत तुलसी साहब

(1763 ई0 - 1848 ई0)

बाबा देबी साहब

(1841 ई0 - 1919 ई0)

सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस

(1885 ई0 - 1986 ई0)

महर्षि संतसेवी 

(1920 ई0 - 2007 ई0)

महर्षि हरिनन्दन

(1934 ई0)

संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज

 भारतवर्ष के बिहार राज्यान्तर्गत भागलपुर नगर के पतित-पावनी सुरसरि के तट पर अवस्थित कुप्पाघाट में एक शान्त सुपावन आश्रम-परिसर के बीच एक प्राचीन गुफा है। उसी गुफा में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने कठिन तपस्या करके दिव्य ज्ञान प्राप्त किया था।
 महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज का अवतरण इस धराधाम पर विक्रमी संवत् 1942 के वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि तदनुसार 28 अप्रैल, 1885 ई0, मंगलवार को अपने मातामह के यहाँ खोखशी श्याम (मझुवा) ग्राम में हुआ था। यह ग्राम सहरसा जिले (अब मधेपुरा जिले) के उदाकिशुनगंज थानान्तर्गत पड़ता है। आपके नाना का नाम श्रीविद्यानाथ दास था।
 आपका पितृगृह पूर्णियाँ जिले के बनमनखी थानान्तर्गत सिकलीगढ़ धरहरा में पड़ता है।
 आपके पूज्य पिता मैथिल कर्ण कायस्थ कुलभूषण बाबू श्रीबबूजनलाल दासजी थे एवं माता जनकवती देवी थी। आपके जन्मराशि पर का नाम रामानुग्रहलाल दास था। आपके चाचा पूज्य श्रीभरतलाल दासजी ने प्यार से आपका नाम ‘मेँहीँ लाल’ रखा। आप जन्मजात योगी थे। जन्म-धारण के समय से ही आपके सिर पर सात जटाएँ थीं, जो प्रतिदिन कंघी से सुलझा दिए जाने पर भी पुनः उलझ जाती थीं। जब आप चार वर्ष के थे, उसी समय आपकी पूजनीया माताजी इस संसार को छोड़कर परलोकगामिनी हो गईं।
 आपकी प्राथमिक शिक्षा का शुभारम्भ अपने ही ग्राम के विद्यालय में हुआ था। प्रवेशिका की शिक्षा आप पुरैनियाँ जिला स्कूल से प्राप्त कर रहे थे। आपकी अभिरुचि सुख-सागर, रामचरितमानस, महाभारत आदि धर्मग्रंथों की ओर बहुत अधिक थी। 4 जुलाई, 1904 ई0 को आप प्रवेशिका परीक्षा दे रहे थे। उस दिन अंग्रेजी की परीक्षा थी। उसमें एक प्रश्न आया था-
 ष्फ़नवजम तिवउ उमउवतल जीम चवमउ श्ठनपसकमतेश् ंदक मगचसंपद पज पे लवनत वूद म्दहसपेीष्ण् अर्थात् ‘निर्माणकर्त्ता’ शीर्षक पद्य को अपने स्मरण से लिखकर उसकी व्याख्या करो।
 ‘निर्माणकर्त्ता’ शीर्षक कविता की चार पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
 ष्थ्वत जीम ेजतनबजनतम जींज ूम तंपेमए
 ज्पउम पे ूपजी उंजमतपंसे पिमसकय
 फ़नत जव-कंले ंदक लमेजमतकंलेए
 ।तम जीम इसवबो ूपजी ूीपबी ूम इनपसकष्ण्
 इन चार पंक्तियों की आपने जो व्याख्या की, उसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है-‘हमलोगों का जीवन-मंदिर अपने प्रतिदिन के सुकर्म वा कुकर्मरूपी ईंटों से बनता वा बिगड़ता है। जो जैसा कर्म करता है, उसका वैसा ही जीवन बनता है। इसलिए हमलोगों को भगवद्भजनरूपी सर्वश्रेष्ठ ईंटों से अपने जीवन-मंदिर की दीवाल का निर्माण करते जाना चाहिए।’ व्याख्या करते-करते आपमें वैराग्य तीव्रतम हो गया और आपने रामचरितमानस की यह पंक्ति-‘देह धरे कर यहि फल भाई। भजिय राम सब काम बिहाई।।’ लिखकर उत्तर- पुस्तिका निरीक्षक को सुपुर्द कर दी और उत्कट आध्यात्मिक अन्तःप्रेरणा से प्रेरित होकर साधु-संतों की खोज में निकल गये। कितने पहाड़ों, गुफाओं, मंदिरों और तीर्थस्थलों में भ्रमण किया। कितने दिनों तक भूखे रहे। इसी क्रम में आप एक दरियापंथी साधु जोतरामराय निवासी श्रीरामानन्द स्वामी से दीक्षित हुए। उन्होंने मानस जप, मानस ध्यान और खुल नेत्र से किये जानेवाले त्रटक की क्रिया बतलायी। आपने वर्षों तक इसका अभ्यास किया; लेकिन आत्म-ज्ञान की पूर्णता की पिपासा बनी ही रही। अपनी आशा की पूर्ति नहीं होते देख उसको छोड़ दिया और पुनः साधु-संतों की खोज-ढूँढ़ करने लगे। यह उचित भी था; क्योंकि अध्यात्म-पथ के पथिकों को कच्चे-अधूरे गुरु से पूरी मदद नहीं मिल सकती।
 सन् 1909 ई0 में मुरादाबाद-निवासी सद्गुरु बाबा देवी साहब के पत्र-आदेश पर उनके ही शिष्य भागलपुर के मायागंज महल्ले के निवासी श्रीराजेन्द्रनाथ सिंहजी ने आपको दृष्टियोग की दीक्षा दी। उसी वर्ष भागलपुर में विजयादशमी के अवसर पर बाबा देवी साहब के प्रथम दर्शन आपको हुए। श्रीराजेन्द्रनाथ सिंहजी ने आपका हाथ बाबा देवी साहब के हाथ में थमाते हुए कहा कि ये ही आपके सद्गुरु हुए।
 बाबा देवी साहब का प्रवचन सुनकर एवं उनके अलौकिक व्यक्तित्व को देखकर आपको बड़ी शांति मिली और आप उनके शरणागत हो गये। 1914 ई0 को पूज्य बाबा देवी साहब ने आपको नादानुसंधान (सुरत-शब्द-योग) की क्रिया बतला दी। आप उस साधना-विधि को करने लगे। आप अपने पितृगृह सिकलीगढ़ धरहरा से कुछ दूर पश्चिम और दक्षिण हटकर एक खेत में अपने से कुआँ खोदकर उसके अन्दर कठिन साधना करने लगे। कुएँ के अन्दर रहते-रहते आपका शरीर पीला हो गया। तब भक्तों ने कहा-‘महाराजजी! शरीर रहेगा, तब तो भक्ति होगी।’ उनलोगों की बात मानकर आपने कुएँ में अभ्यास करना छोड़ दिया; लेकिन साधना में पूर्ण सफलता न होते देख आपने व्यग्रतावश अनेक एकांत स्थानों की खोज की। अंत में भागलपुर के मायागंज महल्ले में पहुँचे। यहाँ की प्राचीन गुफा, एकान्त स्थान और गंगा का रमणीक दृश्य देखकर यह स्थान आपको बहुत अच्छा लगा। अतः आप इसी स्थान में अपनी साधना करने का विचार कर यहाँ निवास करने लगे और गुफा के अन्दर 18 महीनों तक कठिन तपस्या कर कैवल्य पद (संतपद) को प्राप्त कर विश्व में संतशिरोमणि महर्षि मेँहीँ परहंसजी महाराज के नाम से विख्यात हुए।
 आपका जीवन सीधा-सादा था। आपका अंतरंग और बहिरंग अभिन्न था। करनी और कथनी में एक मेल था। आप अपने सिद्धांत के प्रति बड़े आस्थावान् थे। आपने गृहस्थ-जीवन से सुदूर रहकर ब्रह्मचर्यमय जीवन बिताया। संत चरणदासजी की वाणी में हमलोग पढ़ते हैं कि पिता से सौ गुणा अधिक माता प्यार करती है। माता से सौ गुणा अधिक प्यार हरि करते हैं और हरि से सौ गुणा अधिक प्यार गुरुदेव करते हैं। सद्गुरु में विशेषता यह है कि वे प्यार भी करते हैं और अवगुण भी दूर करते हैं। यह अवगुण दूर करनेवाला काम माता, पिता और हरि नहीं कर पाते हैं। यह आपके जीवन में अक्षरशः उतरा हुआ था। संसार का कोई भी ऐसा व्यक्ति देखने में नहीं आया, जो आपके सम्पर्क में आकर आपका आदर-प्यार पाने से वंचित रहा हो। यह तो आश्चर्य की ही बात होगी कि आप-जैसे निर्मल संत के पास जाकर भी कोई निराश लौटा हो।
 आपकी पोशाक गैरिक रंग में रँगे खादी कपड़े की होती थी। आप खड़ाऊँ, प्लास्टिक चप्पल या कपड़े के जूते पहनते थे। आप बहुत कम एवं सीधा-सादा भोजन करते थे। ईश्वर-चिन्तन ही एकमात्र आपका ध्येय था। आपका सादा जीवन एवं उच्च विचार अनुकरणीय एवं स्मरणीय है। आप 08-06-1986 ई0 को इहलोक-लीला समाप्त कर नश्वर संसार से अविचल धाम चले गये। जबतक सृष्टि रहेगी, आपका नाम रहेगा। यह जीवन-चपला चमक-दमककर अंतरिक्ष में लीन हो जाती है; पर उज्ज्वल कीर्ति यहाँ रह जाती है और जिसकी कीर्ति है, वह सदा जीवित रहता है-‘कीर्तिः यस्य स जीवति।’ संत मरते नहीं हैं। वे शरीर छोड़कर भी अमर हो जाते हैं।

परम सन्त तुलसी साहब 

संतों के विषय में सही और पूरी जानकारी कम ही प्राप्त होती है । तुलसी साहब के जीवन का वृत्तान्त तो और भी दुर्लभ है । उनके प्रारम्भिक जीवन का विवरण अस्पष्ट और धुंधला है । यद्यपि वे उन्नीसवीं सदी के मध्य तक रहे, फिर भी उनके मूल नाम, उनके पिता और परिवार के बारे में इतिहास मौन है ।

तुलसी साहब के प्रारम्भिक जीवन के विषय में जो विभिन्न विवरण मिलते हैं, वे संक्षेप में यहाँ दिये जाते हैं ।

बेल्वेडियर प्रेस द्वारा प्रकाशित तुलसी साहब के ‘रत्न सागर’ (प्रथम प्रकाशन ûùúù ईú) में दिये गये जीवन-चरित्र के अनुसार तुलसी साहब का जन्म एक उच्च ब्राह्मण परिवार में हुआ था । किशोर अवस्था से ही आपको संसार के प्रति अरुचि थी । छोटी उम्र में ही सब कुछ त्याग दिया और अन्त में जिला अलीगढ़ के हाथरस शहर में आकर रहने लगे । इस वृत्तान्त में तुलसी साहब के असली नाम, उनके माता-पिता के नाम तथा उनके जन्मस्थान के विषय में कोई उल्लेख नहीं है ।

इसी प्रेस ने सन् ûùûû में तुलसी साहब का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘घट रामायण’ प्रकाशित किया । इसके प्रारम्भ में तुलसी साहब के जीवन चरित्र के विषय में और प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है । इसके अनुसार तुलसी साहब का जन्म सन् ûझ्öý में हुआ और ûøþý में øú वर्ष की आयु में आपने शरीर छोड़ा । वे पुना के राजा û के सबसे बड़े पुत्र थे । वे जाति के ब्राह्मण थे तथा उनका नाम श्यामराव था । उनकी इच्छा के विरुद्ध छोटी उम्र में ही उनके पिता ने उनका विवाह कर दिया । उनकी पत्नी का नाम लक्ष्मीबाई था और इस विवाह से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई । उनके पिता की रुचि अध्यात्म और प्रभु-भक्ति की ओर थी । वे अपनी गद्दी त्यागकर श्यामराव को राज्य देना चाहते थे ताकि बाकी जीवन भक्ति में बितायें । परन्तु श्यामराम खुद भी संसार की ओर से उदासीन थे और राज्य-वैभव की जिन्दगी के प्रति उनमें कोई झुकाव न था । अपने राज्याभिषेक के एक दिन पहले ही वे अपने महल से भाग निकले । काफी तलाश के बाद भी जब श्यामराव का पता न चला तो उनके छोटे भाई को राजा बनाया गया ।

श्यामराव कई वर्षों तक जंगलों, पहाड़ों, गाँवों और शहरों में घूमते रहने के बाद हाथरस में आये । हाथरस को आपने अपना स्थायी निवास बनाया और अपना बाकी जीवन यहीं बिताया । यहीं आप तुलसी साहब के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

आचार्य क्षितिजमोहन सेन, डॉú राजकुमार वर्मा, डॉú पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी तथा अन्य आधुनिक विद्वानों ने ऊपर दिये दो वृत्तान्तों में से एक को अपनाया है । ü

महाराष्ट्र के एक प्रमुख इतिहासवेत्ता श्रीविट्ठल राú ठकार ने हाल ही में पेशवा-वंश के दस्तावेजों का अध्ययन करके तुलसी साहब के विषय में कुछ खोज की है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि तुलसी साहब पेशवा परिवार से संबंधित थे । यद्यपि श्रीठकार की खोज अभी पूरी नहीं हुई है, फिर भी उनका कथन है कि इस बात के पक्ष में समुचित आधार हैं कि तुलसी साहब वास्तव में पेशवा बाजीराव के प्रथम दौहित्र (बाजीराव प्रथम की कन्या के पुत्र) अमृत राव थे । उनका जन्म ûझ्öý-öþ में हुआ था और जब वे तीन-चार वर्ष के थे, तब रघुनाथ राव ने उन्हें गोद ले लिया था । इस प्रकार अमृतराव बाजीराव द्वितीय के बड़े भाई थे । शुरू से ही अमृतराव स्वभाव से गम्भीर, विवेकशील और निष्कपट थे । राजनैतिक षड्यंत्रें से उन्हें घृणा थी । पेशवा दरबार के राजनैतिक दाव-पेंचों से ऊबकर वे सन् ûøúþ में पूना छोड़कर बनारस आ गये और अपना जीवन मालिक की भजन-बंदगी में लगा दिया । ûøúø-ù में आप हाथरस आये और यहाँ अपने अंतिम समय ûøþý तक रहे । परन्तु यह स्पष्ट पता नहीं लगता कि अमृतराव कब और कैसे तुलसी साहब के नाम से पुकारे जाने लगे ।

ऊपर दिये वृत्तान्तों पर गौर करने से यह पता चलता है कि इन सभी में कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें काफी हद तक सही माना जा सकता है । संक्षेप में ये इस प्रकार है:

तुलसी साहब ने उच्च तथा कुलीन परिवार में जन्म लिया था और वे पेशवा के राजवंश में से थे ।

उनका जन्म अट्ठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ था । आध्यात्मिक ध्येय की प्राप्ति के लिए सांसारिक ऐश्वर्यों को त्यागने की ओर शुरू से उनका झुकाव था ।

वे अपने जन्म-स्थान से भागे और कोई पहचान न ले, इसलिए अपने को छिपाये रखा । हो सकता है कि अपने को अज्ञात रखने के लिए ही उन्होंने अपना नाम श्यामराव रख लिया हो ।

उन्होंने बहुत भ्रमण और अनेक यात्रएँ कीं और अन्त में जिला अलीगढ़ के हाथरस शहर को अपना स्थायी निवास-स्थान बनाया ।

यह भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि तुलसी साहब दक्षिण भारत से आये थे; क्योंकि लोग उन्हें ‘दक्खिनी बाबा’ के नाम से पुकारते थे ।

इस बात का कोई पता नहीं लगता कि तुलसी साहब को कब सतगुरु मिले और न यह ही पता लगता है कि सुरत-शब्दयोग के मार्ग में वे कब दीक्षित हुए । जब वे पूना में राजकुमार थे, उस समय या बाद में जबकि सब कुछ त्यागकर उन्होंने एक भ्रमणशील जीवन अपनाया ।

तुलसी साहब ने अपनी रचनाओं में सतगुरु के प्रति अपनी श्रद्धा तो प्रकट की है, पर उनके नाम का उल्लेख नहीं किया है । एक मराठीभाषी विद्वान् ने एक पत्रिका में लिखा है, श्श् तुलसी साहब को उनके गुरु ने हाथरस शहर में दीक्षा दी और अपने गुरु के आदेश के अनुसार उन्होंने बहुत अभ्यास किया है ।य् û

सभी युगों में, सब सन्तों ने परमात्मा की प्राप्ति के लिए वक्त के सतगुरु की आवश्यकता पर जोर दिया है । सन्तमत में सतगुरु की बहुत जरूरत है । सतगुरु के बिना आन्तरिक रूहानी यात्र संभव नहीं है ।

तुलसी साहब ने अपनी रचनाओं में स्थान-स्थान पर गुरु की आवश्यकता पर जोर दिया है । आप बड़े स्पष्ट शब्दों में ‘रत्न सागर’ में लिखते हैं:

बिन सतगुरु उपदेस, सुर नर मुनि नहि निस्तरे ।

ब्रह्मा बिस्नु महेस, और सभन की को गिने ।।

सतगुरु बिना भव माहि भटके, अटक नहि गुरु की गही ।

भृंगी भवन नहि कीट पावे, उलटि भृंगी ना भई ।।

(रत्न सागर, पृú झ्)

स्वयं तुलसी साहब ने भी गुरु धारण किया था, इसके संकेत उनके कई शब्दों में मिलते हैं । अपने सतगुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए आप फरमाते हैं:

सतगुरु अगम अपार, सार समझि तुलसी कियो ।

दया दीन निरधार, मोहि निकार बाहिर लियो ।।

सतगुरु संत दयाल, करि निहाल मो को दियो ।

सुरति सिध सुधार, सार पार जद लखि पर्यो ।।

(घट रामायण, भाग û, पृú ø)

इसी प्रकार तुलसी साहब सतगुरु की कृपा से अपने अन्दर हुए परिवर्तन का वर्णन एक सुन्दर दृष्टांत के द्वारा करते हैं:

मैं लोहा जड़ कीट समाना । गुरु पारस संग कनक कहाना ।।

तुलसी सतगुरु पारस कीन्हा । लोहा सुगम अगम लखि लीन्हा ।।

(घट रामायण, भाग ü, पृú ûùû)

धीरे-धीरे तुलसी साहब के पास जिज्ञासुओं और शिष्यों के बड़ी संख्या में समुदाय आने लगे । ब्राह्मण से शूद्र तक सभी जाति के लोग, गरीब से लेकर अमीर तक सभी स्तर के लोग, विद्वान् और अनपढ़ किसान उनके सत्संग में आने लगे । तुलसी साहब सत्संग के लिए हाथरस से बाहर भी जाया करते थे । उत्तर प्रदेश के ग्रामों और शहरों में वे प्रायः जाया करते थे । उनके शिष्यों में आगरा के सेठ दिलवाली सिह, उनकी पत्नी महामाया, उनकी माता, सास तथा बहन भी थीं । ये सभी तुलसी साहब के प्रेमी शिष्य थे तथा तुलसी साहब कई बार आगरा आते-जाते रहते थे । आगरा में आप पन्नी गली में सेठ दिलवाली सिह के घर में ठहरते थे तथा वहीं सत्संग करते थे ।

सन् ûøûझ् में अक्टूबर महीना था । वर्षा के बाद सेठ दिलवाली सिह के यहाँ रेशमी, जरी के कपड़े, कमख्वाब व कीमती ऊनी कपड़े, शाल आदि छत पर धूप में सुखाये जा रहे थे । एक दिन पहले ही वर्षा हुई थी । इससे गलियों में कीचड़ था । तुलसी साहब के पैर कीचड़ में सने हुए थे । तुलसी साहब को आते देख सेठ दिलवाली सिह की माताजी और अन्य महिलाएँ बहुत आनन्दित हुईं । उन्होंने मत्था टेका और विनती की कि वे उन्हीं कपड़ों पर विराजें । तुलसी साहब मिट्टी और कीचड़ में सने पैरों के साथ उन बहुमूल्य वÐों पर चलकर बैठ गये । सतगुरु के प्रेम और भक्ति में मग्न, घर की महिलाओं का खयाल कपड़ों पर मिट्टी लगने की ओर नहीं गया । उनकी विनती स्वीकार करके तुलसी साहब ने उन वÐों पर चरण रखे । यह देखकर वे बहुत प्रसन्न हुईं । तुलसी साहब ने कहा, श्श् अरे, मैंने तो तुम्हारे कीमती कपड़े मिट्टी से बिगाड़ दिये ।य् इस पर सेठ दिलवाली सिह की माता ने प्रेम और ममता के साथ उत्तर दिया, श्श् नहीं, साहबजी ! û कुछ भी नहीं बिगड़ा है । आपने तो हमें अपने दर्शन से कृतार्थ कर दिया । सब कुछ आपका ही है, इन कपड़ों में हमारा क्या है ? उनकी भक्ति-भावना को देखकर तुलसी साहब ने कहा, श्श् मैं तुमसे बहुत खुश हूँ । जो भी चाहो, माँग लो, मैं खुशी से दे दूँगा ।य्

इस पर सेठ दिलवाली सिह की माताजी ने अर्ज किया, श्श् आपकी दया-मेहर से हमारे पास सब कुछ है, किसी चीज की जरूरत नहीं है । परन्तु--य् अपनी पुत्रवधू की ओर संकेत करते हुए उन्होंने विनती की, श्श् महामाया को कुछ चाहिए ।य् सेठ दिलवाली सिह की धर्मपत्नी महामाया को कोई पुत्र नहीं था । तुलसी साहब ने दया-मेहर की उसी मौज में फरमाया, श्श् हाँ, इसे पुत्र प्राप्त होगा, परन्तु उसे साधारण मनुष्य मत समझना ।य्

अगस्त, ûøûø में सेठ दिलवाली सिह और महामाया को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई । पुत्र का नाम शिवदयाल सिह रखा गया, जो आगे जाकर परम सन्त के रूप में प्रकट हुए और राधास्वामीजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

तुलसी साहब विनम्र और सहिष्णु थे । उनका व्यवहार सभी के प्रति प्रेमपूर्ण था । जहाँ अपने विचारों को व्यक्त करने में वे दृढ़ और स्पष्ट थे, वहीं अपने व्यवहार में सौम्य और मृदु थे । कई बार विद्वान्, पंडित और पुरोहित अथवा मठाधीश उनसे बहस करने आते थे । कभी-कभी तो वे उनसे लड़ने के विचार से आते और कठोर वचनों का प्रयोग करते । परन्तु तुलसी साहब हमेशा उठकर उनका स्वागत करते, झुककर प्रणाम करते और पधारकर उनकी कुटिया को पवित्र करने के लिए उनका आभार मानते । वे उन्हें अपने से ऊँचे आसन पर बिठाते और उनके आक्रोशपूर्ण कठोर वचनों को बड़े धैर्य से सुनते । घट रामायण में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जिनसे प्रकट होता है कि तुलसी साहब किस प्रकार अपनी नम्रता तथा अपने सौम्य और प्रेमपूर्ण व्यवहार के द्वारा अपने विरोधियों का हृदय जीत लेते थे ।

अपने शिष्यों के प्रेम और भक्ति का तुलसी साहब बहुत आदर करते थे । एक बार वे आगरा गये और पन्नी गली में स्वामीजी महाराज के यहाँ पहुँचे । यह सुनकर कि सतगुरु शहर में आये हैं, कुछ महिलाएँ जो कि पास ही रहती थीं, दर्शन के लिए दौड़ी आयीं । उनमें से कई घर के कामकाज में लगी हुई थीं और जैसी थीं, वैसी ही स्वामीजी के घर की ओर दौड़ पड़ीं । आकर उन्होंने बड़ी भक्ति के साथ तुलसी साहब को मत्था टेका और उनके आसपास बैठ गयीं । तुलसी साहब के एक शिष्य ने जब देखा कि उनके कपड़ों में से दुर्गंध आ रही है तो उनसे कहा कि वे दूर हटकर बैठें; क्योंकि उनके कपड़ों में से पसीने की बदबू आ रही है । तुलसी साहब ने उसे रोकते हुए कहा, श्श् भाई, इन्हें बैठे रहने दो । तुम्हें इनके प्रेम की खुशबू का पता नहीं । तुम नहीं जानते कि किस भक्ति-भावना के साथ ये यहाँ आयी हैं । तुम्हें इनमें से बदबू आती है, मुझे नहीं आती ।य्

शेख तकी नामक एक फकीर हज से लौट रहा था । संयोग से उसने अपना तम्बू तुलसी साहब की कुटिया के सामने लगाया । इस प्रकार उसे तुलसी साहब से मुलाकात और बातचीत का मौका मिला । परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग के बारे में अपने वार्तालाप में तुलसी साहब ने शेख तकी को समझाया कि मनुष्य का शरीर ही असली मस्जिद है और इसी में खुदा रहता है । इंसान के हाथों से बनायी हुई ईंट-पत्थरों की मस्जिद में वह नहीं रहता । उनसे मिलने का रास्ता भी इंसान के शरीर में ही है । वह रास्ता तीसरी आँख अथवा ‘नुक्ताए सवैदा’ में से शुरू होता है । आँखों के इस केन्द्र में सारी सृष्टि का भेद छिपा हुआ है । ‘कुन’, शब्द या दिव्य धुन खुदा के महल के दरवाजे की कुंजी है, लेकिन यह केवल पूरे सतगुरु से ही मिल सकती है ।

दिल का हुजरा साफ कर, जाना के आने के लिये ।

ध्यान गैरों का उठा, उसके बिठाने के लिये ।।

चश्मे दिल से देख यहाँ जो जो तमाशे हो रहे ।

दिल सितां क्या क्या हैं तेरे दिल सताने के लिये ।।

एक दिल लाखों तमन्ना उस पै और ज्यादा हविस ।

फिर ठिकाना है कहाँ उसको बिठाने के लिये ।।

नकली मन्दिर मस्जिदों में जाय सद अफसोस है ।

कुदरती मस्जिद का साकिन दुख उठाने के लिये ।।

कुदरती काबे की तू मेहराब में सुन गौर से ।

आ रही धुर से सदा तेरे बुलाने के लिये ।।

क्यों भटकता फिर रहा तू ऐ तलाशे यार में ।

रास्ता शहरग में है दिलवर पै जाने के लिये ।।

मुरशिदे कामिल से मिल सिद्क औ सबूरी से तकी ।

जो तुझे देगा फहम शहरग के पाने के लिये ।।

गोश बातिन हो कुशादा जो करे कुछ दिन अमल ।

ला इलाह अल्लाह हो अकबर पै जाने के लिये ।।

यह सदा ‘तुलसी’ की है आमिल अमल कर ध्यान दे ।

कुनकुराँ में है लिखा अल्लाहू अकबर के लिये ।।

सभी सन्तों की शिक्षा अपने मूल रूप में एक ही है । वे सभी ‘परमात्मा की उस बादशाहत’ का जिक्र करते हैं, जो कि हमारे अन्दर में है । वे उसकी प्राप्ति का मार्ग बताते हैं और वहाँ जाने की विधि सिखाते हैं । वे अन्य सन्तों से भिन्न कोई शिक्षा देने का दावा नहीं करते । परन्तु उनके जाने के बाद उनके शिष्य धीरे-धीरे उनकी असली शिक्षा को भूलकर बाहरमुखी कर्मों, रिवाजों आदि में उलझ जाते हैं । उनके निर्मल रूहानी सन्देश को वे बाहरी परिपाटियों और कर्मकाण्ड का रूप दे देते हैं । असली गुर (भेद) को खोकर वे छिलके समेटने में लग जाते हैं ।

तुलसी साहब के संसार में आने से पहले पिछले सन्तों के अनुयायी अपने सतगुरु के मूल संदेशों को भूलकर पंथ बनाये बैठे थे । कबीर, दादू, पलटू, दरिया आदि सन्तों के अनुयायी कबीर-पंथी, दादू-पंथी, पलटू-पंथी, दरिया-पंथी के नाम अपना चुके थे ।

तुलसी साहब ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे कोई नया मार्ग नहीं बतला रहे हैं, बल्कि वही शिक्षा दे रहे हैं जो कबीर साहब, नानक साहब, दादू साहब तथा अन्य सन्तों की है । अपनी इस बात की पुष्टि में तुलसी साहब अपने ‘घट रामायण’ में कबीर, रविदास, दादू तथा अन्य सन्तों के शब्दों के उद्धरण देते हैं । तुलसी साहब ने पहली बार सभी सन्तों की शिक्षा के लिए ‘सन्त-मत’ वाक्य का प्रयोग किया और इस प्रकार विभिन्न सन्तों की शिक्षा की एकता और समानता को प्रकट करने का प्रयास किया ।

तुलसी साहब की रचनाओं में शब्दावली, रत्नसागर, घटरामायण तथा एक छोटी अपूर्ण पुस्तिका पद्य-सागर है । शब्दावली में तुलसी साहब की फुटकर रचनाओं, पदों, शब्दों आदि का संग्रह है । इनमें से अधिकांश पद संगीत के विभिन्न रागों पर आधारित हैं और सन्तमत के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालते हैं । ‘घट रामायण’ और ‘रत्न-सागर’ कथोपकथन की शैली में लिखी गई है । इसमें तुलसी साहब शिष्यों और जिज्ञासुओं के प्रश्नों का समाधान करते हैं । ‘घट रामायण’ में तुलसी साहब के समय में प्रचलित विभिन्न धर्मों के सिद्धान्तों का विवेचन तथा सन्तमत की दृष्टि से उनकी व्याख्या है । रत्न-सागर के विषय हैं-सृष्टि की रचना, स्वर्ग और नरक, काल, मन, मृत्यु, सन्तों की शिक्षा, सन्तों की दया, अन्दर के भेद आदि । तुलसी साहब की सभी रचनाओं के समान ही रत्न सागर में भी पूरे सतगुरु की महिमा, सतगुरु की आवश्यकता और उनके सत्संग के लाभ पर काफी लिखा गया है । मृत्यु के समय सन्त किस प्रकार अपने शिष्य की आत्मा की सँभाल करते हैं, रत्न-सागर में इसका भी स्पष्ट वर्णन किया गया है ।

तुलसी साहब की रचनाओं में संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा के शब्दों का काफी प्रयोग हुआ है । तुलसी साहब के समय में दक्षिण के कई राज्यों में फारसी राजकीय भाषा थी, अतएव पेशवा परिवार से संबंधित होने के कारण तुलसी साहब को फारसी का अच्छा ज्ञान रहा होगा । परन्तु इसके साथ ही आपकी रचनाओं में ब्रज, अवधी, मराठी, राजस्थानी (मारवाड़ी), गुजराती, पंजाबी और मैथिली शब्दों का भी प्रयोग हुआ है । इससे स्पष्ट होता है कि अन्य सन्तों की तरह तुलसी साहब भी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, बिहार आदि प्रदेशों में बराबर यात्रएँ करते रहे होंगे । परन्तु आपका स्थायी निवास-स्थान हाथरस नगर की सीमा पर स्थित जोगिया ग्राम में एक कुटिया ही रहा । यहाँ आप अपने अन्तिम समय तक रहे तथा सन् ûøþý में अस्सी वर्ष की आयु में धुरधाम को प्रयाण कर गये ।

परम संत बाबा देवी साहब

उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़, तहसील हाथरस में श्रीमहेश्वरी लालजी कानूनगोई का काम करते थे । कहा जाता है कि श्रीमहेश्वरी लालजी की कई संतानें काल-कवलित हो चुकी थीं । इस कारण वे दुखी रहते थे । इनके परिवार के लोग हाथरस किले के पास रहनेवाले संत तुलसी साहब के भक्त थे । संत तुलसी साहब कभी-कभी इनके घर पधारने की कृपा करते थे ।
एक दिन संत तुलसी साहब का आगमन महेश्वरी लालजी के घर पर हुआ । श्री महेश्वरी लालजी को चिन्तित देख संत तुलसी साहब कहने लगे- श्श् संतान की चिन्ता मत करो । तेरे घर एक पवित्र आत्मा का जन्म होगा ।य्
कुछ काल के लिए संत तुलसी साहब हाथरस किले से बाहर सत्संग प्रचारार्थ चले गये । इधर मुंशी महेश्वरी लालजी को सन् ûøþû ईú के मार्च महीने में रविवार के दिन एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई । बालक का नाम देवी प्रसाद रखा गया । जब मुंशी महेश्वरी लालजी को ज्ञात हुआ कि परम संत तुलसी साहब हाथरस लौट आये हैं, तो वे तत्काल अपनी पत्नी और बच्चे के साथ उनकी कुटिया पर आशीर्वाद लेने पहुँच गये । संत तुलसी साहब ने प्रसन्नतापूर्वक अपना दाहिना हाथ बच्चे के सिर पर रखकर उसे आशीर्वाद दिया और बोले- श्श् इसे साधारण बालक न समझना ।य्
जब बालक देवी प्रसाद की अवस्था साढ़े छह वर्ष की हुई तो योग्य अध्यापक की देखरेख में उनकी शिक्षा का शुभारम्भ हुआ । वे तीक्ष्ण बुद्धि के थे । पढ़ाई-लिखाई के पाठ एवं सबक को यथाशीघ्र निबटाकर किसी गंभीर चितन में मग्न हो जाते ।
एक दिन इनके अध्यापक ने पूछा- श्श् तुम खाली बैठकर क्या सोचा करते हो ?य् उन्होंने सकुचाते हुए विनीत भाव से निवेदन किया- श्श् मेरे मन में यह बात आती रहती है कि इस संसार के रचयिता कौन हैं ? जीव कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है ?य् अध्यापक ईश्वर-संबंधी चर्चा को सुन गंभीर होते हुए बोले- श्श् अभी तुम्हें अपनी पढ़ाई-लिखाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि आगे वह तुम्हारे काम आवे ।य्
एक बार आर्यसमाज के प्रवर्त्तक स्वामी दयानन्दजी सरस्वती भ्रमण करते हुए हाथरस पहुँचे । देवी साहब को साथ लेकर उनके चाचाजी स्वामीजी के दर्शनार्थ गये । चाचाजी देवी प्रसाद की जन्मपत्री भी साथ ले गये थे । यथोचित नमस्कार-बंदगी के पश्चात् उन्होंने जन्मपत्री स्वामीजी को देखने को दी । जन्मपत्री हाथ में लेते हुए स्वामीजी ने पूछा- श्श् इसका क्या करूँ ?य् देवी प्रसादजी ने कहा- श्श् आपसे अपना ग्रह जानने के लिए लाया हूँ ।य् स्वामीजी ने कहा- श्श् पहले यह बताओ कि तुम्हारी आस्था किस पर है ?य् देवी प्रसादजी ने कहा- श्श् एक परमेश्वर पर है ।य् स्वामीजी ने फिर पूछा- श्श् वह कैसा है, कहाँ रहता है और किस प्रकार प्राप्त होता है ?य् देवी प्रसादजी ने साधिकार कहा- श्श् स्वामीजी ! वह सबसे बड़ा और सबसे सूक्ष्म है, सबके अन्दर रहता है । उसकी प्राप्ति का मार्ग अपने अन्दर है, जो किसी ज्ञानी-गुरु के द्वारा प्राप्त होता है ।य् स्वामीजी ने पूछा- श्श् तुम देवालय जाकर ठाकुरजी की पूजा भी करते हो ? देवी प्रसाद ने उत्तर दिया- श्श् मनुष्य-शरीर सबसे श्रेष्ठ ठाकुरबाड़ी है, जिसमें परमपिता परमात्मा सहित सभी देव-देवियों का निवास है । इसे छोड़कर आप किस देवालय में जाने की बात पूछते हैं ?य्
बालक देवीप्रसाद के उत्तर को सुनकर स्वामीजी बड़े प्रसन्न हुए और जन्मपत्री लौटाते हुए बोले- श्श् बच्चा ! आनन्द से रहो, तुम्हारे सब ग्रह अच्छे हैं ।य्
देवीप्रसादजी की पूजनीया माताजी का देहावसान तब हुआ, जब वे चौदह वर्ष के थे । माता के वियोग की व्यथा से इनका मन पढ़ाई-लिखाई से ही नहीं, संसार से भी उचट गया । पिताजी आगे की शिक्षा जारी रखना चाहते थे । अतः समझा-बुझाकर इनका नामांकन एक अंग्रेजी स्कूल में कराया गया । उस स्कूल की शिक्षा समाप्त होते ही पिताजी भी उन्हें सदा के लिए छोड़कर परलोक सिधार गये । इन पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा । संसार की नश्वरता का बोध इन्हें घर-परिवार त्यागकर फकीरी जीवन व्यतीत करने को बाध्य करने लगा । परिवार के लोग इन्हें गृहस्थी के बंधन में बाँधना चाहते थे, लेकिन बाँध नहीं सके ।
देवी प्रसादजी के संबंधी भाई श्रीपद्यदासजी जो इनके प्रति विशेष स्नेह रखते थे तथा राधास्वामी मत के सत्संगी थे और आगरा के डाकघर में नौकरी करते थे । उन्हीं के स्नेहवश देवी साहब हाथरस से आगरा गये । वहाँ इनकी मुलाकात राधास्वामी मत के द्वितीय आचार्य रायबहादुर शालिग्राम साहबजी से हुई, जो पोस्टमास्टर जनरल के पद पर कार्यरत थे । श्रीपद्यदासजी ने उनसे देवी प्रसाद की एकान्त में साधु-जीवन व्यतीत करने की इच्छा बतलायी । राय साहब ने देवी प्रसाद से कहा- श्श् तुम यहीं रहकर सत्संग-भजन करो । इस समय भीख माँगकर साधु-जीवन बिताना कष्टकर है । लोग साधु को भार समझते हैं और श्रद्धापूर्वक भिक्षा नहीं देते हैं । जब तुम्हें भिक्षा की चिन्ता लगी रहेगी, तो साधन-भजन यथासमय कैसे कर सकोगे ? मैं पोस्ट ऑफिस में ही तुम्हारी नौकरी लगवा देता हूँ, जिससे तुम्हारा काम बन जाएगा ।य्
इस तरह समझा-बुझाकर ýú/- रुपये मासिक वेतन पर उन्होंने नौकरी लगवा दी । बाबा देवी साहब को काम के सिलसिले में कई शहरों, कस्बों में जाना पड़ता । सन् ûøøû ईú में इनकी बदली मुरादाबाद हो गयी । वहाँ के एक प्रेमी सज्जन के आवास पर आप रहने लगे । आपने वर्षों की नौकरी से अर्जित सम्पत्ति वंशीधरजी को सौंप दी । वंशीधरजी ने इस धन को व्यापार में लगा दिया और बाबा देवी साहब को ýú/- रुपये प्रति माह की स्थायी आय होने लगी । अब बाबा देवी साहब नौकरी से त्याग-पत्र देकर साधन-भजन में मस्त रहने लगे ।
बाबा देवी साहब का रहन-सहन और भोजन बहुत साधारण था । चाहे कोई भी मौसम हो, वे एक लम्बा काला कुर्ता पहना करते थे । साहू वंशीधरजी के शरीर-त्याग के बाद एक अन्य श्रद्धालु भक्त मुंशी बुलाकीदासजी अपनी कोठी पर बाबा देवी साहब को ले आये । वहीं सत्संग-प्रचार का कार्य होने लगा । इसी बीच बाबा देवी साहब ने ‘बाल का आदि और उत्तर का अन्त’ नामक पुस्तक छपवायी । इस्लाम धर्म के वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित करनेवाली एक अन्य पुस्तक ‘शरफे इस्लाम’ की आपने रचना की ।
बाबा देवी साहब ने üö फरवरी ûøøö ईú को अपने दो सहयोगियों मुंशी रघुवर दयाल और बलदेव कहार के साथ धर्म-प्रचार हेतु यात्र आरम्भ की । कई स्थानों लखनऊ, बनारस, डुमराँव, बक्सर, बाँकीपुर, जमालपुर, मुँगेर, भागलपुर आदि की यात्र की । बाबा साहब जहाँ जाते, विज्ञापन-पत्र छपवाकर बँटवाते । श्रद्धालुओं के बीच सन्तमत की बातों को समझाते । धर्म-प्रचार के क्रम में आप आगे बोधगया, मोकामा, समस्तीपुर, दरभंगा, मुजफ्रफरपुर, छपरा, देवरिया, गोरखपुर, बस्ती आदि शहरों में भी गये ।
बाबा देवी साहब का प्रचार-कार्य ûøøö से ûùûö ईú तक अबाध गति से चलता रहा । इसी क्रम में धरहरा, पूर्णियाँ (बिहार) निवासी महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज का संपर्क परम संत बाबा देवी साहब से हुआ । महर्षि मे ँही ँ को परम संत देवी साहब सच्चे सद्गुरु के रूप में सन् ûùúù ईú में मिले और उनकी जन्म-जन्म की चिरसंचित अभिलाषा की पूर्त्ति हुई ।
परम संत बाबा देवी साहब की दया-मेहर इन पर होती रही । बाबा देवी साहब का कथन था- श्श् देखो, यह अपने पिता और पढ़ना-लिखना छोड़कर कुछ वर्षों से साधु के वेश में है । अब यह मेरे पास आया है । मैं इसे अपना लड़का और सगा भाई समझता हूँ । इसलिए इसपर कड़ाई करता हूँ और डाँटता हूँ, जिससे यह शीघ्र ही योग्य बन जाय ।य्
 श्श् तुम एक पंथ-दरिया-पंथ के अन्दर थे । अब दरियापंथी नहीं, समुद्रपंथी हो गये । अब तुम अपने को समुद्रपंथी समझो ।य्
 महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज को अपने गुरु बाबा देवी साहब से आशीर्वाद इस रूप में प्राप्त हुआ- श्श् आपसे ज्यादह सन्तमत में कोई आदमी नहीं हो सकता । और तन-मन-धन से गुरु की खिदमत करना चाहिये ।य्---- श्श् चाहे आपको खाना मिले या न मिले, लेकिन आपकी बराबरी का मजहब में कोई नहीं हो सकता ।य्
भेद असल सार, परम सरल आर,
बाबा देवी साहब प्रकासिये, जीव उबारत रे की ।
मे ँही ँ युगल कर जोड़ी नवत सर,
धन गुरु परम दयाल, कहल भल भेदियो रे की ।। (महर्षि मे ँही ँ पदावली)
जाहिर जहूर सतगुरु देवि साहब, भेद बतावयँ खासा ।
मे ँही ँ कहत सुनो जो शरण गहैं, लहैं निज घट के विलासा ।।
संतों की ये युक्तियाँ बहुत दिनों से छिपी हुई थीं । बाबा देवी साहब ने इन युक्तियों का जनसाधारण में प्रचार किया । सद्गुरु महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महाराज बाबा देवी साहब को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आपकी ही कृपा से ये युक्तियाँ संसार में फैलीं ।
संतन केर यह भेद छिपल छल, बाबा कयल परचार ।
तोहर कृपा से बाबा आहो देवी साहब, मे ँही ँ जग फैली गेल भेद ।।
सन्तन मत भेद प्रचार किया,
गुरु साहब बाबा देवी ने ।।
सन् ûùûö ईú के बाद बाबा देवी साहब ने मुरादाबाद के बाहर जाकर सत्संग-प्रचार का कार्य बंद कर दिया । दूर-दूर से श्रद्धालु भक्तजन मुरादाबाद आकर ही उनके दर्शन और सदुपदेशों का लाभ लेने लगे । ûùûø ईú से बाबा साहब की अन्तर्मुखता प्रगाढ़ होने लगी । वे बाहरी ज्ञान से प्रायः शून्य एवं प्रभु में लीन रहने लगे । ûÿ जनवरी ûùûù ईú से बाबा साहब की अवस्था सर्वथा भिन्न होने लगी । उन्होंने ûø जनवरी के संध्याकाल में मुरादाबाद के सत्संगियों को बुलाया और पास बिठाकर अपना अन्तिम उपदेश दिया- श्श् दुनिया वहम है, अभ्यास करो ।य्
ûù जनवरी ûùûù, रविवार के दिन प्रातःकाल लगभग साढ़े आठ बजे सन्तमत के महान् पुरोधा परम संत बाबा देवी साहब ने सदा के लिए अपने भक्तों-प्रेमियों और संसार से विदा ले ली ।

महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज 

भारतवर्ष में आदिकाल से संत-महात्माओं की अपनी विशिष्ट परम्परा रही है। प्रत्येक कालखण्ड में इस प्रकार की दिव्य आत्माओं ने जन सामान्य का मार्ग-दर्शन कर समाज में आई कुरीतियों को दूर करने में अपना योगदान किया है। दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से परित्रण हेतु लोगों को धार्मिक जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया है। उन्हीं संतों की परम्परा में पूज्यपाद महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज भी हुए हैं।

 पूज्यपाद महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज का आविर्भाव बिहार राज्यान्तर्गत मधेपुरा जिले (पूर्व सहरसा) के गमहरिया गाँव में सन् 1920 ई0 के 20 दिसम्बर को हुआ। माता-पिता ने इनका नाम महावीर रखा। बचपन में ये महावीर बजरंगवली के अनन्य उपासक भी थे। हनुमान चालीसा इन्हें कंठस्थ था और ये नित्य उसका पाठ किया करते थे। 

 महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज की शिक्षा मिड्ल तक ही हो पाई। ये आगे नहीं पढ़ सके। घरेलू खर्च के लिए इन्होंने छात्रें को ट्यूशन पढ़ाना आरम्भ किया। 

 एक समय की बात है। ये अररिया जिला (पूर्व पूर्णियाँ) के सैदाबाद ग्राम में अध्यापन कार्य करते थे। यहाँ से कुछ दूरी पर कनखुदिया गाँव में मार्च, 1939 ई0 में बाबा लच्छन दासजी ने सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज की स्वीकृति पाकर मास-ध्यानाभ्यास का आयोजन किया था। महर्षिजी वहाँ मास भर ठहरे थे। यह शुभ अवसर जान इनके अंदर पड़ा भक्ति-बीज प्रस्फुटित हो चला। भक्ति की ज्वाला तेज हो गई। ये उनके दर्शनार्थ चल पड़े। वहाँ सद्गुरु महर्षि मेँहीँ के शरणागत हो, इन्होंने भजन-भेद लेने की इच्छा व्यक्त की। गुरु ने शिष्य की पात्रता को पहचाना। आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने की उत्सुकता देखकर महर्षि मेँहीँ ने इन्हें 29 मार्च, 1939 ई0 में मानस जप, मानस ध्यान और दृष्टियोग की दीक्षा दी। इन्होेंने पुनः इच्छा व्यक्त की कि गुरुदेव इस तुच्छ सेवक को अपने चरणों में रख लेने की कृपा करें। गुरुदेव का उत्तर था-‘आप जो कर रहे हैं, करें। समय पर बुलाऊँगा।’ अनुमति प्राप्त कर आप सैदाबाद चले आए, जहाँ अध्यापन-कार्य करते थे।

 महर्षि मेँहीँ चरित में वर्णन आया है-1940 ई0 में बभनगामा (भागलपुर) के एक सत्संग में वहाँ के श्रीकालीचरणजी सत्संगी ने महर्षिजी से निवेदन किया-‘सरकार! इनको साथ में रख लिया जाता, तो अच्छा होता। इनके स्वर में बड़ी मिठास है, संतवाणियों का पाठ बहुत अच्छा करते हैं।’ महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने उत्तर दिया-‘मन तो मेरा भी करता है; लेकिन अभी इनकी माँ को क्यों रुलावें।’ (महर्षि मेँहीँ के दिनचर्या उपदेश, पृष्ठ 149)

 ये गुरु-प्रदत्त साधना को एकनिष्ठ होकर तत्परता से विधिवत् करते रहे। सन् 1940 ई0 से 1945 ई0 तक ये महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज के आज्ञानुसार उनके पास आया-जाया करते तथा भ्रमण-कार्य में सम्मिलित होकर ध्यानाभ्यास करते हुए विविध प्रकार की सेवाएँ भी कर लिया करते। (महर्षि मेँहीँ के दिनचर्या उपदेश, पृष्ठ 119)

 सन् 1946 ई0 में इनकी माताजी परलोक सिधार गईं, तब गुरुदेव ने इन्हें अपने पास बुला लिया। सत्संग के प्रचार में वे कहीं जाते, तो इन्हें साथ ले लेते। गुरुदेव इनसे ग्रंथ-पाठ कराते और भजन गवाते। इनकी वाणी में मधुरता थी और आवाज सुरीली थी। 

 सद्गुरु महर्षि मेँहीँ इन्हें पुत्रवत् स्नेह देते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक धरहरा आश्रम में रखकर इन्हें मनिहारी आश्रम भेज दिया। मनिहारी आश्रम में गुरुदेव ने इन्हें गुरुमुखी लिपि सिखायी। 

 आपकी इच्छा-पूर्ति करने के लिए महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने आपको दस वर्षों तक अपनी कसौटी पर कसकर सन् 1949 ई0 में सदा के लिए आपको अपने सेवार्थ रख लिया। तब से 8 जून, 1986 ई0 तक (जब महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने अपना पार्थिव शरीर छोड़ा) आपने गुरु-सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। लगातार 37 वर्षों तक संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ के श्रीचरणों में रहकर जो सेवा-कार्य सम्पादित किया, वह गुरु-शिष्य परम्परा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

 2 जून, सन् 1952 ई0 को सिकलीगढ़ धरहरा में प्रसन्न होकर गुरुदेव ने आपको नादानु- संधान की क्रिया बता दी और दिनांक 27 अक्टूबर, 1957 ई0 को संन्यास प्रदान किया।

 गुरु और शिष्य का संबंध एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का होता है। आपकी अटूट सेवा-भक्ति से प्रसन्न होकर आपके गुरु महाराज ने आपको ‘संतसेवी’ का पद प्रदान किया था। तब से आप ‘संतसेवी’ नाम से जगत् में प्रसिद्ध हुए हैं। आप छाया की भाँति अपने गुरु महाराज की सेवा में सतत संलग्न रहे। कभी आप अपने गुरु महाराज को अकेले नहीं छोड़ते थे। यह है आपकी गुरु-सेवा, गुरु-भक्ति। इसीलिए तो आपके गुरु महाराज कहते थे कि ‘मुुझमें और संतसेवीजी में कोई फर्क नहीं है। जो मैं हूँ, सो संतसेवीजी हैं।’

 आपने अपने श्रीसद्गुरु महाराज की छत्रच्छाया में लगभग अर्द्ध शताब्दी तक रहकर उनकी ऐसी सेवा और साधना की कि गुरु-कृपा से आदिनाम का साक्षात्कार कर आप परमहंस हो गए। कबीर साहब ऐसे संतों के बारे में कहते हैं-

    आदिनाम निज सार है, बुझि लेहु सो हंस । 

     जिन जान्यो निज नाम को, अमर भयो सो वंस ।।

  3 मई, 1997 ई0 में अखिल भारतीय संतमत-सत्संग के 86वें वार्षिक महाधिवेशन में देश-विदेश के धर्माचायोर्ं, महामण्डलेश्वरों एवं विद्वानों ने एक स्वर से आपको ‘महर्षि परमहंस’ की उपाधि से विभूषित कर अध्यात्म-जगत् को गौरव प्रदान किया। तब से आप ‘महर्षि संतसेवी परमहंस’ के रूप में जाने जाते हैं।

 महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज का उद्घोष है कि परमेश्वर के महल के द्वार की कुँजी सद्गुरु के पास होती है। सद्गुरु की सहायता के बिना कोई भी उस महल में प्रवेश नहीं पा सकता। सद्गुरु की महिमा बतलाते हुए वे कहते हैं-‘भगवान हमें धनवान बना सकते हैं, पर हमारे निर्माण और निर्वाण तो संत सद्गुरु के हाथों में ही है।’ सद्गुरु ईश्वर के साकार रूप हैं। श्रद्धा और आस्था के साथ उनके चरणों में अपने को न्योछावर करके मानव सदा के लिए भवचक्र से छूट सकता है। 

 मानव-जीवन की सफलता भोगों की बहुलता में नहीं, भगवद्भजन की मादकता में है। सदाचरण सम्पन्न जन मरकर भी अमर रहते हैं; किन्तु आचरणहीन जन जीवित ही मृत होते हैं। जैसे बिना द्रव्य के व्यापार नहीं चल सकता, उसी भाँति सत्संग के बिना आध्यात्मिक जीवन अग्रसर नहीं हो सकता। पशु-पक्षी अपने आहार के लिए, सामान्य जन अपने परिवार के लिए और संत जन विश्व उपकार के लिए जीवन धारण करते हैं। जीव परम पिता परमात्मा से पृथक होकर इस पिण्ड में आया है। यह पुनः वहाँ जाकर उससे मिल जाए, तो स्थिरता आ जाएगी। स्थिरता आ गई, तो शांति मिल गई और शांति मिल गई, तो सुख मिल गया।

 4 जून, 2007 को देदीप्यमान सूर्य ने इहलौकिक काया का परित्याग कर लौकिक जगत् से विदाई ले ली। ऐसे दिव्य पुरुष, ज्योतिर्मय स्तम्भ महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज के चरणों में नमन।